Thursday, 11 August, 2022
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अब इसे ‘उलटा प्रदेश’ नहीं, ‘एनकाउंटर प्रदेश’ कहिए

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दस महीने में 39 गैंगस्टरों का सफाया करके अपराध पर लगाम लगाने के जो दावे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार कर रही है उसकी हकीकत का खुलासा कर रही है ‘दिप्रिंट’ की यह खोजी रिपोर्ट. प्रस्तुत है इसकी पहली किस्त:

लखनऊ: देश के सबसे अराजक माने जाने वाले प्रदेश में पिछले 10 महीनों में 1,142 एनकाउंटरों में कथित 39 अपराधियों को मार गिराया गया. और यह सिलसिला अभी थमा नहीं है. प्रदेश की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने कार्यकाल का पहला साल इसी महीने पूरा करने वाले हैं, इसलिए जाहिर है कि इस आंकड़े को ‘कानून का शासन’ बहाल करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया जाएगा.

आखिर सुशासन यही तो है कि जनता खुशी का और पुलिस जोश का अनुभव करे, और अपराधियों में जान जाने का खौफ इस कदर समा जाए कि वे जमानत मिलने पर भी जेल से बाहर आने को राजी न हों, और जो जेल से बाहर हैं वे पुलिस के आगे समर्पण करने लग जाएं.

लेकिन ‘दिप्रिंट’ की पड़ताल से इस रक्तरंजित आंकड़े की कई पोल सामने आ रही है, कई गंभीर सवाल उभर रहे हैं कि क्या बात-बात पर गोली दागने को तैयार पुलिस को छुटभैये अपराधियों का खात्मा करने का लाइसेंस दे दिया गया है, ताकि उसे अपराध पर लगाम लगाने में बड़ी सफलता के रूप में पेश किया जा सके? क्या ये हत्याएं अवैध नहीं हैं? और क्या इनमें से कुछ हत्याएं राजनीतिक दुश्मनी का नतीजा नहीं हैं?

‘दिप्रिंट’ के रिपोर्टरों ने पूरे प्रदेश का दौरा करके इन 39 एनकाउंटरों में से हरेक की गहन पड़ताल की. बताया जाता है कि इनमें मारे गए लोगों में डकैत, चोर, फिरौती वसूलने वाले, शूटर और यहां तक कि वाहनचोर भी शामिल हैं. लेकिन इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसका नाम प्रदेश सरकार की ‘सबसे वांछित अपराधियों’ की सूची में दर्ज रहा हो. ‘दिप्रिंट’ के रिपोर्टरों ने पुलिस द्वारा मार गिराए गए कथित अपराधियों के परिवारों और इन एनकाउंटरों में शरीक पुलिसवालों से बात करने के अलावा पोस्टमार्टम रिपोर्टों, मजिस्ट्रेट जांच रिपोर्टों और केस फाइलों का भी अध्ययन किया ताकि तथ्यों की पुष्टि हो और सवालों के जवाब मिले. प्रायः हर एनकाउंटर और हत्या के जो कारण पुलिस ने बताए, उनमें साफ घपले नजर आए.

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जिस किसी को एनकाउंटर में गोली मारी गई उसके बारे में यही दर्ज किया गया कि पहले उसने ही पुलिस पर गोली चलाई थी. अधिकतर पुलिसवाले बुलेटप्रूफ जैकेट में थे. सारे एनकाउंटर ऐसी खुली जगहों में हुए जहां कोई चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं था. गौर करने वाली बात यह है कि मारे गए कई लोगों के शरीर की कई हड्डियां टूटी हुई थीं, उन्हें खोपड़ी और रीढ़ की हड्डी में भी चोट लगी थी. पुलिस का कहना है कि ये चोट इसलिए लगीं क्योंकि कथित अपराधी दौड़ कर या वाहन से भागने की कोशिश में गिर गया. लेकिन उनके परिवारवालों का कहना है कि उन्हें गिरफ्तारी के दौरान खूब पीटा गया और फिर मार डाला गया.

सारे एफआइआर एक जैसे ही थे

समय: रात 8 बजे से 2 बजे या सुबह 4 बजे से 7 बजे के बीच. पुलिस को गुप्त सूचना मिलती है कि लूटपाट या हत्या करने के इरादे से अपराधियों का एक गिरोह किसी खास इलाके से गुजरने वाला है. पुलिस चौकस हो जाती है, महत्वपूर्ण चराहों या मोड़ पर चेकपोस्ट लगाकर उनका इंतजार करती है. ’ उसे कुछ दूर से कोई बाइक या कार आती दिखती है तो उसे रुकने का इशारा करती है. पुलिस को देखते ही ड्राइवर भागने की कोशिश करता है और गोलियां चलाने लगता है. पुलिस तब तक उसका पीछा करती है जब तक वह खुली जगह पर नहीं पहुंच जाता. वहां दोनों तरफ से गोलियां चलती हैं. एक अपराधी को गोली लगती है, वह गिर पड़ता है और उसके साथी अंधेरे में भाग जाते हैं या झाड़ियोों में छिप जाते हैं. घायल अपराधी को अस्पताल लाया जाता है, जहां वह इलाज के दौरान मर जाता है. एक पुलिसवाला भी घायल होता है क्योंकि गोली उसके बुलेटप्रूफ जैकेट को भेद देती है, या उसकी बांह को छूकर निकल जाती है.

सभी 39 एनकाउंटर में, जिनमें अपराधियों की मौत हुई, उनके साथी भाग निकलने में सफल रहे.

सभी एफआइआर में एक ही तरह की चीजों की बरामदगी का जिक्र है- जिंदा कारतूसों के साथ या तो .32 बोर की पिस्तौल का या 9मीमी की पिस्तौल या देसी कट्टे का.

चार मामलों को, जिनमें एक मामले में एक पुलिसवाला मारा गया, छोड़कर बाकी सभी मामलों में अपराधियों द्वारा चलाई गई गोली या तो पुलिसवालों को छूकर निकल गई या उनके बुलेटप्रूफ जैकेट में लगी.

पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट में चोट की वजह का जिक्र नहीं

‘दिप्रिंट’ ने जिन एफआइआर को देखा, उनमें से अधिकतर में इस बात का जिक्र पाया कि अपराधी ने भागने की कोशिश की तो उसे बाहरी या अंदरूनी चोटें लगीं या खोपड़ी, छाती की हड्डी, रीढ़ की हड्डी, घुटने की हड्डी टूटी. लेकिन उनके परिजनों का आरोप् है कि पुलिस उन्हें उठाकर ले गई, हिरासत में उन्हें भयानक यातनाएं दी गईं और फिर एनकाउंटर का नाटक करके उन्हें मार डाला.

आजमगढ़ से मिली एक खबर बताती है कि कथित अपराधी को 21 जगह चोट लगी थी, जिनमें 16 गोलियां लगने के घाव शामिल हैं, जबकि उसी एनकाउंटर में पुलिसवालों को मामूली चोटें आईं.

मुजफ्फरनगर में मारे गए एक कथित अपराधी की पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट कहती है कि उसने कार से फरार होने के लिए पुलिस पर गोली चलाई, उसके ललाट के बीचोबीच गोली लगी. गोली लगने की जगह पर 1.5 गुना 1 सेमी का घाव था, तो गोली निकलने की जगह पर 2 गुना 1.5 सेमी का घाव था. इसे साफ है कि उसे एकदम करीब से गोली मारी गई. यह पुलिस के इस दावे को झूठा साबित करता है कि उसे भागने के क्रम में गोली लगी. गोली लगने के घाव के अलावा उसकी गरदन पर भी घाव के निशान थे.

इसी तरह, बागपत में मारे गए एक कथित अपराधी की पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट में कहा गया है कि उसकी छाती और घुटनों की हड्डियां कइ जगह से टूटी हुई थीं, गरदन और खोपड़ी पर घाव थे. उसे सीने में गोली मारी गई थी.

हत्या या मुठभेड़?

पुलिस ने अदालत और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में जो एफआइआर और हालात की रिपोर्ट दायर की है उनमें कहा गया है कि अपराधियों की मौत इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने भागने की कोशिश में गोलियां चलाई तो पुलिस की जवाबी गोलीबारी में वे मारे गए. लेकिन सबूत बताते हैं कि उन अपराधियों को इससे बहुत पहले ही गिरफ्तार किया गया था.

बागपत के एक मामला बताता है कि 3 अक्टूबर 2017 को मारे गए एक 22 वर्षीय अपराधी को पुलिस जब 1 अक्टूबर 2017 को उठाकर ले गई तो उसके पिता ने मुख्यमंत्री कार्यालय में शिकायत दर्ज करवाई थी कि उसका बेटा ‘लापता’ है. पिता ने ‘दिप्रिंट’ को बताया कि उन्हें मालूम था कि डकैती के मामलों मे शामिल उसके बेटे को एनकाउंटर में मार दिया जाएगा, इसलिए उन्होंने एक दिन पहले ही सीएम के पोर्टल पर, डीएम के यहां शिकायत दर्ज की थी. लेकिन उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, और 3 अक्टूबर को उसकी हत्या कर दी गई. कुछ मामलों में परिवारवाले आरोप लगाते हैं कि पुलिस की टीमों ने इन अपराधियों की गिरफ्तारी से कुछ दिन पहले ही उन पर इनामों की घोषणा की थी. इसके बाद उन्हें मार डाला गया.

विपक्ष, खासकर समाजवादी पार्टी ने इन एनकाउंटरों पर सवाल उठाए हैं. इनके विरोध में उसने विधानसभा के अदर भी विरोध प्रदर्शन किया. सपा प्रवक्ता और एमएलसी सुनील यादव साजन कहते हैं, ‘‘जिन पर छोटे-मोटे अपराधों के आरोप हैं, उन्हें क्या मौत दी जानी चाहिए? क्या वे घुटे हुए अपराधी थे?’’

सरकार के भीतर भी सवाल उठ रहे हैं. योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री, और भाजपा की सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने मुख्यमंत्री योगी को पत्र लिखा है कि आजमगढ़ के मुकेश राजभर की मौत की सीबीआइ जांच करवाएं. राजभर पर 50,000 रु. का इनाम रखा गया था.

लेकिन सरकार तो पूरे जोश में है. आखिर योगी ने कई बार घोषणा की है कि अपराधियों का सफाया करके राज्य मे कानून-व्यवस्था लागू की जाएगी. 15 फरवरी को विधान परिषद में एक भाजपा एमएलसी के सवाल के जवाब में योगी ने कहा कि ‘‘यह अफसोस की बात है कि कुछ लोग अपराधियों के प्रति हमदर्दी जता रहे हैं. यह लोकतंत्र के लिए खतरे की बात है. एनकाउंटर जारी रहेंगे.’’

ऐसी ही बात प्रदेश के पुलिस प्रमुख ओ.पी. सिंह ने ‘दिप्रिंट’ के साथ बातचीत में कही, ‘‘सरकार ने अपराधियों का हिसाब करने का फैसला कर लिया है. या तो राज्य से बाहर जाएंगे या जेल जाएंगे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपराधियों की बाढ़ है, जो इस राज्य को अपना पनाहगाह मान बैठे हैं. वे यहां आते हैं, अपना काम करते हैं और भाग जाते हैं. उनके खिलाफ अभियान छेड़ कर हम बेहतर माहौल बनाना चाहते हैं. स्थानीय लोगों से हमें काफी समर्थन मिल रहा है.’’

राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि अपराध में भारी वृद्धि के बाद राज्य सरकार ने एनकाउंटर का सहारा लिया है. इससे सरकार को तुरंत लोकप्रियता मिलती है क्योंकि लोगों को लगता है कि कानून को अपने हाथ में लेने वालों का सफाया करके पुलिस अच्छा काम कर रही है.

उत्तर प्रदेश में सबसे चर्चित एनकाउंटर 1980 में वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौर में हुए थे. उस समय प्रदेश मध्य प्रदेश और राजस्थान के साथ ही डकैतों से परेशान था. डकैतों के लिए विशेष कानून बनाया गया था, जिसमें उन लोगों के खिलाफ बेहद सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया गया था, जो डकैतों को प्रश्रय देते थे या उनकी लूट के सामान को ठिकाने लगाने में मदद करते थे. उस समय कई एनकाउंटर हुए लेकिन मुलाम सिंह यादव, जॉर्ज फर्नांडीस, कर्पूरी ठाकुर जैसे विपक्षी नेताओं ने इन पर कई सवाल उठाए और विरोध प्रदर्शन किए. अंततः सिंह ने 18 जुलाई 1982 को इस्तीफा दे दिया.

बात-बात में गोली दागने वाली पुलिस

डीजीपी सिंह कहते हैं कि इन्हें एनकाउंटर मत कहिए. यह अपराधियों पर हमला है. अब तक हमने 3000 से ज्यादा अपराधियों को धर दबोचा है. उन पर इतनी दबिश जरूरी थी और इससे उनके हौसले टूटे हैं.’’ यह सच है कि 39 अपराधियों के मारे जाने और 265 के घायल होने के अलावा 5,000 को गिरफ्तार किया गया है. और 167 पर रासुका लगाया गया है.

पिछले साल सितंबर में एनकाउंटरों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को छूट दे दी कि वे अपराधियों के लिए बड़े इनाम की घोषणा कर सकते हैं. अब एसएसपी 5,000 रु. की जगह 15,000 रु. के इनाम की घोषणा कर सकता है और आइजी 25,000 रु. की जगह 1 लाख रु. के इनाम की घोषणा कर सकता है.

सुपर कॉप की नयी पौध आज सेलिब्रिटी बन गई है, जिनकी तारीफ जनता से लेकर सरकार तक करती है. मसलन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शामली के एसएसी अजय पाल शर्मा को स्थानीय लोगों ने सम्मानित किया, उन्हें एक रथ में बिठाकर उनका रोड शो किया क्योंकि पुलिस ने दो अपराधियों, नौशाद और सरवर का सफाया कर दिया था. पिछले नवबंर में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने भी उन्हें सम्मानित किया था. आजमगढ़ के एसएसपी अजय कुमार साहनी भी ऐसे ही एक पुलिस अधिकारी हैं. इस साल के शुरू में योगी उन्हें अपने हेलिकॉप्टर में बिठाकर एक चीनी मिल तक ले गए थे. साहनी की देखरेख में पांच एनकाउटर किए गए थे.

डीजीपी सिंह कहते हैं कि ‘‘संदेश साफ है. अब हममस अपराध और अपराधियों के प्रति कोई रियायत न देने की नीति अपना ली है.’’

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