Thursday, 7 July, 2022
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भारत में ‘एहतियाती डोज’ को मंजूरी के बाद कोविड वैक्सीन की बूस्टर डोज के बारे में जानिए जरूरी बातें

प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को यह घोषणा की कि 10 जनवरी से कोविड टीके की बूस्टर डोज लगाए जाने की शुरुआत की जाएगी. वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि दूसरी खुराक के कुछ समय बाद प्रतिरक्षा कम हो जाती है और इसलिए बूस्टर डोज की अनुशंसा की गयी है.

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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को घोषणा की कि फ्रंटलाइन वर्कर्स, कॉमोर्बिडिटी वाले लोग और 60 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति 10 जनवरी से कोविड-19 वैक्सीन की बूस्टर खुराक (प्रतिरक्षा शक्ति बढ़ाने के लिए टीके की अतिरिक्त खुराक) के लिए पात्र होंगे.

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि 15 से 18 साल के बच्चों के टीकाकरण का कार्य भी आगामी 3 जनवरी से शुरू होगा. आईसीएमआर और भारत बायोटेक के कोवैक्सीन टीके को अब 12 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के लिए आपातकालीन उपयोग की मंजूरी मिल गई है.

शनिवार रात राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा कि ये निर्णय वैज्ञानिक सलाहकारों के परामर्श के बाद लिए गए हैं.

यह फैसला बूस्टर खुराक की बढ़ती हुई मांग के बीच लिया गया है क्योंकि नए- नए उभरते हुए कोरोनावायरस के वैरिएंट, जैसे ओमीक्रॉन ने इसके मामलों में नए उछाल की आशंका उत्पन्न कर दी है.

भारत सरकार के कुछ शोधकर्ताओं सहित कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस बात का संकेत दिया है कि टीकों से उत्पन्न होने वाली प्रतिरक्षा शक्ति कुछ महीनों के बाद कम हो जाती है और डेल्टा एवं ओमीक्रॉन जैसे कोरोनावायरस वैरिएंट टीकों की प्रभावकारिता को कम करते हैं.

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इस बीच, ऐसी भी खबरें आ रही थी कि स्वास्थ्य कर्मियों ने नए ओमीक्रॉन वैरिएंट के फैलने की आशंकाओं के बीच अपनी मनमर्जी से ही टीके की बूस्टर खुराक लेना शुरू कर दिया था.

हालांकि, स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा की जा रही प्रेस ब्रीफिंग्स में अधिकारियों ने सप्ताह दर सप्ताह इसी बात को जोर देकर कहा था कि भारत बूस्टर खुराक शुरू करने से पहले अपनी पूरी आबादी को टीके की दो खुराक देकर पूर्ण टीकाकरण पर ध्यान केंद्रित करेगा.


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बूस्टर डोज की अनुशंसा

इस महीने की शुरुआत में, इन्साकोग- भारत में जीनोम अनुक्रमण प्रयोगशालाओं की निगरानी करने वाले एक नेटवर्क ने अपनी बुलेटिन में कहा था कि 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों, विशेष रूप से संक्रमण के प्रति उच्च जोखिम वाले लोगों, को बूस्टर शॉट्स दिए जाने चाहिए.

लेकिन दो दिनों के भीतर इस संस्था ने अपने बयान से पलटी मारते हुए कहा था कि इसके द्वारा पहले जारी किया गया बयान ‘राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में बूस्टर खुराक के लिए किसी तरह की कोई सिफारिश या सुझाव नहीं था’.

इसी तरह, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के द्वारा कोविशील्ड के टीके की प्रभावशीलता के अध्ययन में भी शोधकर्ताओं ने बूस्टर खुराक की सिफारिश की थी क्योंकि उन्होंने पाया था कि डेल्टा वैरिएंट के प्रति एंटीबॉडी का स्तर कम हो गया है.

कुछ विशेषज्ञ जिन्होंने पहले बूस्टर खुराक के उपयोग के खिलाफ अपनी राय व्यक्त की थी, उन्होंने भी ओमीक्रॉन वैरिएंट के उभरने के बाद से अपना रुख बदल दिया है.

सोनीपत के अशोका विश्वविद्यालय में भौतिकी और जीव विज्ञान के प्रोफेसर गौतम मेनन ने दिप्रिंट को पूर्व में दिए गए एक साक्षात्कार में बताया था, ‘इससे पहले हो सकता है मैंने कहा होगा कि बूस्टर शॉट देने से पहले देश की पूरी आबादी का टीकाकरण करना महत्वपूर्ण है. मगर, ओमीक्रॉन के सामने आने के बाद, पूरी आबादी को टीका लगाए जाने की प्रतीक्षा करने के बजाय उच्च जोखिम वाले लोगों के लिए प्राथमिकता के तौर पर बूस्टर खुराक देना ही समझदारी होगी.’


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घटती प्रतिरक्षा

पूर्व में आईसीएमआर द्वारा किए गए कई अध्ययनों से पता चला था कि कोविड का डेल्टा वैरिएंट वैक्सीन की प्रभावकारिता को कम करता है लेकिन शोधकर्ताओं का कहना था कि एंटीबॉडी का स्तर फिर भी इतना अधिक था कि वह लोगों को गंभीर रूप से बीमार होने से बचा सके.‘

हालांकि, कोवैक्सीन की बूस्टर खुराक की प्रभावकारिता के बारे में कोई डेटा उपलब्ध नहीं है लेकिन पहले से ही कई अध्ययन कोविशील्ड के बूस्टर डोज के उपयोग का समर्थन करते हैं.

अंतराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट ’ में प्रकाशित किये एक अध्ययन में शोधकर्ताओं के एक दल ने पाया था कि ऑक्सफॉर्ड-एस्ट्राजेनेका का कोविड-19 वैक्सीन- जिसे भारत में कोविशील्ड के नाम से वितरित किया गया है- द्वारा दी गई सुरक्षा दूसरी खुराक प्राप्त करने के तीन महीने बाद घट जाती है. इसने सुझाव दिया था कि कोविशील्ड के टीके लगाने वालों में गंभीर बीमारी की अवस्था से सुरक्षा बनाए रखने में मदद करने के लिए टीके के बूस्टर कार्यक्रमों की आवश्यकता है.

इस अध्ययन में पाया गया कि इस टीके की प्रभावशीलता में गिरावट लगभग तीन महीनों के बाद दिखाई देने लगी, जब अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु के खतरे वाले लोगों की संख्या दूसरी खुराक लगाए जाने के दो सप्ताह बाद के इसी तरह की संख्या से दोगुनी थी. पांच महीने के बाद, दूसरी खुराक के दो सप्ताह की तुलना में जोखिम पांच गुना बढ़ गया था.

इस बीच, ऑक्सफॉर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने प्रयोगशाला अध्ययनों में यह पाया कि कोविशील्ड वैक्सीन की एक बूस्टर खुराक ओमीक्रॉन वैरिएंट के खिलाफ एंटीबॉडी के स्तर को काफी हद तक बढ़ा सकती है.

इस अध्ययन में, जिसकी अभी तक पियर रिव्यु (सहकर्मियों द्वारा समीक्षा) नहीं की गई है, शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों ने कोविशील्ड की तीसरी खुराक ली थी उनमें (संक्रमण को) निष्क्रिय करने वाले एंटीबॉडी का स्तर उन व्यक्तियों की तुलना में काफी अधिक थी जिन्हें इस टीके की दो खुराक मिली थीं.

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तरह के परिणाम राष्ट्रीय स्तर की वैक्सीन रणनीतियों के हिस्से के रूप में तीसरी खुराक बूस्टर के उपयोग का समर्थन करते हैं, विशेष रूप से ओमीक्रॉन सहित कोविड के चिंतित करने वाले वैरिएंट्स के प्रसार को सीमित करने के लिए.

इसके अतिरिक्त, इस महीने की शुरुआत में ‘द लैंसेट ’ में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया था कि छह कोविड-19 टीकों तक की बूस्टर खुराक सुरक्षित है और पूरी तरह से टीकाकरण वाले लोगों में मजबूत प्रतिरक्षा संबंधी प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है.

यह अध्ययन उन लोगों पर किया गया था जिन्हें कोविशील्ड या फाइजर-बायोएनटेक के वैक्सीन के साथ टीका लगाया गया था. किसी भी टीके की दो खुराक के बाद दिए गए बूस्टर का यह पहला यादृच्छिक (रैंडम या मनमर्जी से चुने लोगों पर किया गया) परीक्षण था.

इस अध्ययन ने बूस्टर के रूप में प्रयुक्त होने के लिए सात प्रकार के टीकों- ऑक्सफॉर्ड-एस्ट्राजेनेका, फाइजर-बायोएनटेक, नोवावैक्स, जेनसेन, मॉडर्न, वालनेवा और क्योरवैक- की सुरक्षा, प्रतिरक्षा संबंधी प्रतिक्रिया और दुष्प्रभावों की पड़ताल की गयी थी.

ऑक्सफॉर्ड-एस्ट्राजेनेका के टीके की दो खुराक लेने वाले मामलों में सभी बूस्टर टीकों ने प्रतिरक्षा संबंधी प्रतिक्रिया में वृद्धि की. जिन लोगों को फाइजर-बायोएनटेक वैक्सीन की दो खुराक मिली थी, उनमें केवल ऑक्सफॉर्ड-एस्ट्राजेनेका, फाइजर-बायोएनटेक, मॉडर्न, नोवावैक्स, जेनसेन और क्योरवैक ने ही प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को और बढ़ाया.

भारत में फिलहाल क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (सीएमसी), वेल्लोर, बूस्टर खुराक की प्रभावकारिता का मूल्यांकन करने के लिए एक नैदानिक परीक्षण (क्लीनिकल ट्रायल) कर रहा है.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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