Wednesday, 25 May, 2022
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ICMR शोधकर्ता बोले-मोदी सरकार की नीति पूरी तरह प्रभावी नहीं, COVID वैक्सीन सभी के लिए मुफ्त होनी चाहिए

आईसीएमआर के दो शोधकर्ताओं ने अपने एक लेख में यह बताते हुए कि कैसे धीमी शुरुआत और टीकों की कमी के कारण 3% आबादी का ही टीकाकरण हो पाया है, कहा है कि साल के अंत तक एक अरब टीकाकरण का लक्ष्य असंभव नजर आता है.

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नई दिल्ली: भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के दो शोधकर्ताओं की जोड़ी ने सिफारिश की है कि भारत में कोविड-19 वैक्सीन का इस्तेमाल बढ़ाने और संक्रमण से होने वाली मौतों को कम करने के लिए इसको सभी के लिए मुफ्त किया जाना चाहिए.

बीएमजे ग्लोबल हेल्थ जर्नल में इस हफ्ते प्रकाशित होने जा रहे एक एक लेख में, आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मलेरिया रिसर्च की मंजू राही और अमित शर्मा ने यह भी कहा कि अन्य देशों में इस्तेमाल हो रहे विदेशी टीकों को मंजूरी देने के मामले के तात्कालिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए फैसला लिया जाना चाहिए. दिप्रिंट ने इस लेख के पीयर-रिव्यू वर्जन संस्करण को देखा है.

शोधकर्ताओं के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय सहायता और टीकों की मंजूरी के बावजूद देश में वैक्सीन उत्पादन और इसके वितरण की योजना बहुत खराब रही है.

लेखकों ने इसमें कहा है, ‘रोल आउट की धीमी गति और टीकों की कमी के कारण केवल 3 प्रतिशत आबादी का ही पूर्ण टीकाकरण हो पाया है.’

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय कोविड टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा बने दोनों टीके कोवैक्सीन और कोविशील्ड के उत्पादन में तेजी लाने की योजना के बावजूद इस साल एक अरब लोगों को टीका लगाना संभव नहीं हो सकता है. कोवैक्सीन आईसीएमआर और भारत बायोटेक की तरफ से विकसित स्वदेशी टीका है जबकि कोविशील्ड एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का टीका है जिसका उत्पादन सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा किया जा रहा है.

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शोधकर्ताओं ने लिखा, ‘चूंकि वायरस से सुरक्षा कोविड-19 वैक्सीन की दोनों खुराक लेने के कम से कम दो हफ्ते बाद मिलने की उम्मीद होती है, इसलिए आने वाले दिनों-हफ्तों में भारत को संक्रमण में आई मौजूदा तेजी से निपटने के लिए टीकों के कई स्रोतों की जरूरत होगी.’

यद्यपि सरकारी केंद्रों और अस्पतालों में तो कोविड-19 का टीकाकरण निशुल्क है, लेकिन सरकार ने निजी अस्पतालों को टीकाकरण के लिए शुल्क वसूलने की अनुमति दे रखी है.

इस लेख में बताया गया है, ‘वैक्सीन कवरेज बढ़ाने की कवायद के तहत सरकार ने निजी अस्पतालों को टीके के लिए 3 डॉलर से 15 डॉलर (200 से 1,000 रुपये) तक अलग-अलग शुल्क लेने की अनुमति दे रखी है.’

उन्होंने कहा, ‘जनसंख्या का केवल एक बहुत छोटा वर्ग निजी क्षेत्र में इस कीमत पर वैक्सीन का खर्च उठाने में सक्षम होगा, जिससे आबादी का एक बड़ा हिस्सा बिना वैक्सीनेशन के रह जाएगा और इसलिए असुरक्षित होगा.’

निजी अस्पतालों में शुल्क, कोविन प्लेटफॉर्म भी बड़ा फैक्टर

लेखकों ने यह भी नोट किया कि 45 वर्ष से कम आयु वर्ग के लोगों के लिए टीके की लागत पर कंपनियों से बातचीत का जिम्मा राज्य सरकारों पर छोड़े जाने के मोदी सरकार के फैसले ने युवा आबादी के लिए टीकाकरण की लागत और बढ़ा दी है क्योंकि यह केंद्र सरकार की तरफ से निगोशिएट की गई राशि की तुलना में अधिक है.

उन्होंने बताया, ‘उदाहरण के तौर पर कोवैक्सीन की एक खुराक की कीमत केंद्र सरकार के लिए करीब 2 डॉलर (145 रुपये) है, जो राज्य सरकारों के लिए लगभग 5.4 डॉलर (393 रुपये) और निजी अस्पतालों के लिए लगभग 16 डॉलर (1165 रुपये) तक पहुंच जाती है.’

लेखकों ने कहा कि अभी जब गंभीर संकट की स्थिति है, मूल्य निर्धारण में इस तरह का अंतर न केवल असमान वितरण की स्थिति पैदा कर रहा है, बल्कि जनता के बीच अविश्वास बढ़ाने वाला है.

लेखकों के अनुसार, उन्होंने मोबाइल एप के माध्यम से पहले पंजीकरण कराने की सरकारी नीति की भी आलोचना की, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में केवल एक तिहाई लोगों के पास ही इंटरनेट कनेक्शन हैं.

उन्होंने कहा कि सरकार की तरफ से निर्धारित धनराशि पर्याप्त नहीं है, खासकर तब जबकि कई ताजा शोध बताते हैं कि कुछ टीकों के लिए तीसरे बूस्टर शॉट की जरूरत पड़ सकती है.

आईसीएमआर के शोधकर्ताओं ने लिखा, ‘इसलिए, भारत को इस सबके लिए ऐसे कोष की जरूरत है जो भविष्य में वैक्सीन कवरेज की जरूरतों को पूरा करने वाला हो.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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