Sunday, 3 July, 2022
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संसदीय समिति का सुझाव, 10वीं कक्षा तक आर्ट एजुकेशन अनिवार्य हो, ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ से मुक्त होना जरूरी

शिक्षा, महिलाओं, बच्चों, युवाओं और खेल मामलों की स्थायी संसदीय समिति ने संसद को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आर्ट एजुकेशन में भारत की पारंपरिक और लोक कलाओं पर जोर दिया जाना चाहिए.

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नई दिल्ली: एक संसदीय समिति की तरफ से बजट सत्र (जिसमें अभी अवकाश चल रहा है) के दौरान पेश अपनी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में आर्ट एजुकेशन को ‘गुलामी की मानसिकता’ से बाहर लाने और ज्यादा से ज्यादा भारत उन्मुख बनने की जरूरत है.

राज्यसभा सांसद विनय सहस्रबुद्धे की अध्यक्षता वाली शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने सुझाव दिया कि संगीत, नृत्य, विजुअल आर्ट और रंगमंच जैसे विषयों को 10वीं कक्षा तक अनिवार्य बनाया जाना चाहिए.

संसदीय समिति ने परफार्मिंग और फाइन आर्ट की शिक्षा में सुधार को लेकर अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘आर्ट एजुकेशन को 10वीं कक्षा तक अनिवार्य विषय बनाया जाना चाहिए, क्योंकि एनईपी (राष्ट्रीय शिक्षा नीति) 2020 में कला को शिक्षा के साथ जोड़ने पर जोर दिया गया था. और हर स्कूल में इसके लिए बुनियादी ढांचा और सुविधाएं मुहैया कराई जानी चाहिए. आर्ट एजुकेशन में भारत की पारंपरिक और लोककलाओं पर खास जोर देने के साथ चार मुख्यधाराओं संगीत, नृत्य, विजुअल आर्ट्स और रंगमंच को शामिल किया जाना चाहिए.’

संसद में 7 फरवरी को पेश इस रिपोर्ट में कहा गया है, ‘लोककथाओं, कहानियों, नाटकों, चित्रों आदि के रूप में स्थानीय परंपराओं को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए, ताकि इसकी पढ़ाई में रुचि जगे और यह सराहनीय भी बने.’

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ‘आर्ट एजुकेशन को लेकर जिस तरह की औपनिवेशिक सोच कायम’ है, उसे दूर करने के लिए आमूल-चूल बदलावों की आवश्यकता है. इसके लिए एक मजबूत नीतिगत ढांचा विकसित किया जाना चाहिए.

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इसमें कहा गया है, ‘यह महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा व्यवस्था औपनिवेशकालीन होने के परिणामस्वरूप बनी सोच/मानसिकता ऐसा यंत्रवत कार्यबल तैयार कर रही है, जो ज्यादा कुछ सोचने-समझने में माहिर नहीं है, बल्कि केवल नियमित डिजाइन और उत्पादन में ही सक्षम है और साहसिक और रचनात्मक प्रयोग करने से कतराता है.’

समिति ने आर्ट एजुकेशन का पाठ्यक्रम तैयार करने पर काम करने के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) और विभिन्न यूनिवर्सिटी के विभागों जैसे निकायों के साथ विचार-विमर्श करने का सुझाव दिया है.


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राष्ट्रीय महत्व के संस्थान

उच्च शिक्षा के संदर्भ में समिति का सुझावा है कि सरकार को ‘राष्ट्रीय कला विश्वविद्यालय’ या एक केंद्रीय कला विश्वविद्यालय स्थापित करने की संभावना तलाशनी चाहिए.

आर्ट एजुकेशन में अग्रणी भूमिका निभा रहे मौजूदा संस्थानों का जिक्र करते हुए समिति ने कहा कि सरकार को भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीटीआई), पुणे, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी), नई दिल्ली, अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय, मुंबई, और सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई जैसे संस्थानों को ‘राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों’ का दर्जा देने पर विचार करना चाहिए.

समिति ने कहा, ‘इन प्रतिष्ठित संस्थानों/निकायों को इस तरह की प्रामाणिकता/मान्यता हासिल होने से उन्हें अपने काम और अपने विजन के विस्तार में मदद मिलेगी और उनकी शिक्षा और प्रमाणपत्रों की अहमियत भी बढ़ेगी.’ साथ ही कहा कि इससे ऐसे संस्थानों को स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्रियां देने की मान्यता भी मिलेगी.

समिति ने यह सुझाव भी दिया कि अधिक छात्रों को मौका मिले, इसके लिए एफटीआईआई को और अधिक रीजनल सेंटर खोलने चाहिए. साथ ही जोड़ा कि संस्थान को ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑगमेंटेड रियलिटी और मोबाइल टेलीफोनी जैसी उभरती टेक्नोलॉजी पर आधारित पाठ्यक्रम शुरू करने चाहिए, भारतीय फिल्मों को दूसरे देशों तक पहुंचाने के उद्देश्य से विदेशी भाषाओं में सबटाइटल संबंधी एक विंग स्थापित करनी चाहिए. इसके अलावा एक म्यूजिक डिपार्टमेंट स्थापित करना चाहिए और फिल्म प्रबंधन पर भी पाठ्यक्रम शुरू करना चाहिए.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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