Saturday, 4 December, 2021
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सुरंगें, सड़कें, पुल, हेलीकॉप्टर बेस- मोदी सरकार ने अरुणाचल में बुनियादी ढांचे की मजबूती पर पूरा जोर दिया

यद्यपि अधिकांश प्रोजेक्ट की योजना पहले ही बना ली गई थी, लेकिन चीन के साथ जारी गतिरोध ने यह सुनिश्चित किया कि उन्हें तात्कालिक जरूरत के आधार पर तेजी से पूरा किया जाए.

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बम ला (अरुणाचल प्रदेश): चीन की आक्रामकता से मुकाबले के लिए भारत अरुणाचल प्रदेश में अपने बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने में जुटा है—इसमें हर मौसम में सीमावर्ती क्षेत्रों तक आवाजाही सुगम बनाने वाली नई सुरंगों पर तेजी से काम करने के अलावा नई सड़कों का निर्माण, पुल, अग्रिम स्थानों पर हेलीकॉप्टर बेस बनाना और गोला-बारूद के लिए भूमिगत भंडारण वाले ठिकाने तैयार करना शामिल है.

यद्यपि अधिकांश प्रोजेक्ट की योजना पहले ही बन चुकी थी, लेकिन चीन के साथ जारी गतिरोध ने यह सुनिश्चित किया कि उन्हें तात्कालिक जरूरत के आधार पर तेजी से आगे बढ़ाया जाए.

हालांकि, तेजी से निर्माण के बावजूद रक्षा प्रतिष्ठान के सूत्र स्वीकारते हैं कि ‘बुनियादी ढांचे के मामले में हम चीनियों से एक दशक से ज्यादा पीछे हैं.’

चीनी कई सालों से वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के आसपास अपना बुनियादी ढांचा बेहतर करने पर ध्यान दे रहे हैं और उन्होंने एलएसी तक बेहतर सड़क संपर्क बना रखा है.

अरुणाचल प्रदेश में अग्रिम क्षेत्रों के दौरे के दौरान एक सूत्र ने दिप्रिंट को बताया, ‘इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि चीनियों के पास बेहतर बुनियादी ढांचा है. हम इसी को बदल रहे हैं. नई और आधुनिक प्रौद्योगिकी के उपयोग के साथ निर्माणाधीन बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में तेजी लाई गई है, साथ ही और भी परियोजनाएं शुरू की जा रही हैं.’

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एक अन्य सूत्र ने कहा कि पिछले तीन वर्षों में बुनियादी ढांचे में बदलाव आया है. दूसरे सूत्र ने कहा, ‘अब से एक साल बाद चीजें काफी अलग होंगी और समय के साथ बुनियादी ढांचे में सुधार होता जाएगा.’

सूत्र मानते हैं कि चीन के साथ जारी तनाव के मद्देनजर अधिकारियों और सेना को ऐसा महसूस होने लगने लगा है कि यह काम अतिआवश्यक है जो पूरी एलएसी तक केंद्रित है और केवल पूर्वी लद्दाख तक ही सीमित नहीं रह गया है.

परंपरागत रूप से लद्दाख में 832 किलोमीटर लंबी एलएसी की निगरानी 14वीं कोर की एक डिवीजन करती है, और वहीं पूर्वी कमान में 1,346 किलोमीटर लंबी एलएसी की सुरक्षा की जिम्मेदारी इस क्षेत्र में दो कोर (तीन डिवीजन प्रत्येक) को सौंपी गई है, जिसने इसे देशभर में सबसे भारी सुरक्षा वाला एक क्षेत्र बना दिया है.

हालांकि, एलएसी पर बढ़ते तनाव को देखते हुए पूर्वी लद्दाख में अधिक सैनिकों को शामिल किए जाने के साथ सेना की तैनाती के पैटर्न में कई बदलाव किए गए हैं. पूर्वी और उत्तरी दोनों कमानों को भी अब एक-एक अतिरिक्त आक्रामक वाहिनी मिल गई है.


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अरुणाचल प्रदेश में बुनियादी ढांचे के निर्माण से जुड़ी गतिविधियां इस हद तक बढ़ा दी गई हैं कि अधिकारी 700 करोड़ रुपये की अति महत्वपूर्ण सेला सुरंग परियोजना को अगले साल प्रस्तावित समयसीमा से पहले जून में ही पूरा करने की तैयारियों में जुटे हैं.

317 किलोमीटर लंबी बालीपारा-चारदुआर-तवांग (बीसीटी) रोड पर नेसीफू सुरंग के साथ यह रणनीतिक परियोजना, जो अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कामेंग और तवांग जिलों तक जाती है, ये सुनिश्चित करेगी कि रक्षा और निजी दोनों तरह के वाहन पूरे साल इस पर आराम से आवाजाही कर सकें.

सेला सुरंग परियोजना, जिसमें 1,555 मीटर लंबी मुख्य और इस्केप टनल के अलावा 980 मीटर की एक छोटी सुरंग और करीब 1.2 किलोमीटर सड़क का निर्माण शामिल है, यह सुनिश्चित करेगी कि चीनी क्षेत्र में यातायात की आवाजाही का पता लगाने में सक्षम न हों. 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित सेले दर्रा मौजूदा समय में चीनियों की नजरों से बचा नहीं रहता है.

सुरंगों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि बोफोर्स, टैंक और यहां तक कि भविष्य में वज्र हॉवित्जर सहित सेना के तमाम उपकरण आसानी से चीनियों की नजरों में आए बिना इसके माध्यम यहां पहुंचाए जा सकें, इससे सैन्य उपकरणों को लाने में लगने वाला समय बचेगा और साथ ही पूरे साल इस काम में कोई बाधा नहीं आएगी.

अभी सेला दर्रा सर्दियों में भारी बर्फबारी और खराब मौसम के कारण बंद हो जाता है.

सेला सुरंग परियोजना निदेशक कर्नल परीक्षित मेहरा ने दिप्रिंट को बताया, ‘पहली सुरंग सेना दिवस (15 जनवरी) 2022 तक पूरी हो जाएगी जबकि दूसरी जून तक पूरी होगी. यह परियोजना पूरा करने की प्रस्तावित समयसीमा अगस्त से पहले हो जाएगा.’

Work ongoing at the under-construction Sena Tunnel in Arunachal Pradesh. | Photo: Nirmal Poddar/ThePrint
अरुणाचल प्रदेश में निर्माणाधीन सेना की सुरंग में काम चल रहा है. | फोटो: निर्मल पोद्दार/दिप्रिंट

सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) से जुड़े कर्नल परीक्षित को पिछले साल सेला सुरंग परियोजना के लिए चुना गया था. रोहतांग में अटल सुरंग के निर्माण की परियोजना से पांच सालों तक जुड़े रहने के उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें इसके लिए चुना गया.

आईआईटी दिल्ली से एम.टेक डिग्री लेने वाले और ऑस्ट्रिया से एक अन्य मास्टर कोर्स करने वाले कर्नल परीक्षित ने कहा, ‘सेला सुरंग बन जाने पर यह 13,000 फीट की ऊंचाई पर दुनिया की सबसे लंबी दोहरी लेन वाली सुरंग बन जाएगी. अटल सुरंग का अनुभव काफी काम आया क्योंकि हम अत्याधुनिक उपकरणों के साथ बेहद वैज्ञानिक, नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो हमारे लिए यह परियोजना निर्धारित समय से पहले पूरा करने की दिशा में काफी मददगार साबित हो रही है.’

लगभग 180 किलोमीटर लंबी वेस्टर्न एक्सिस, जिसमें शेरगांव-रूपा-तवांग को जोड़ने की योजना है, सैन्य और असैन्य दोनों ही तरह से उपयोग के लिहाज से एक अन्य महत्वपूर्ण परियोजना है.

आखिरकार, इससे असम से तवांग तक आवाजाही के लिए तीन सड़कें हो जाएंगी.

5वीं माउंटेन डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल जुबिन ए. मिनवाला ने कहा, ‘सिर्फ सैन्य दृष्टिकोण से ही नहीं बल्कि नागरिक पहलू से भी बुनियादी ढांचे पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है. ऐसे पहाड़ी इलाकों में कनेक्टिविटी को आसान बनाना काफी मायने रखता है जहां कभी भी मौसम स्थितियां बिगाड़ देता हो.’

हेलीकाप्टर बेस, गोला बारूद के लिए भूमिगत भंडारण सुविधा

सुरंगों के अलावा करीब दो दर्जन पुलों का निर्माण किया जा रहा है, जिनमें से कुछ पर काम पूरा हो चुका है. सूत्रों ने बताया कि सभी प्रकार के सैन्य उपकरणों के लिहाज से ये महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी सुविधा देंगे.

इसके अलावा, सेना ये सुनिश्चित करने पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है कि जरूरत पड़ने पर अग्रिम मोर्चों पर सेना की निर्बाध आवाजाही के लिए अधिक संख्या में हेलीकॉप्टर बेस हों.

जैसा कि दिप्रिंट ने पहले भी जानकारी दी है, पूर्वी कमान में जमीनी स्तर पर सेना बढ़ाने से ज्यादा ध्यान प्रौद्योगिकी पर केंद्रित किया जा रहा है.

भारत प्रौद्योगिकी-आधारित सुरक्षा ग्रिड में अधिक निवेश कर रहा है जो न केवल एलएसी पर पीएलए की गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम हो बल्कि 24×7 गहन निगरानी भी सुनिश्चित कर सके.

एल-70 तोपों, बोफोर्स, एम-777 हल्की होवित्जर तोपों, पिनाका और स्मर्च रॉकेट सिस्टम जैसे सामरिक सिस्टम के साथ भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि उसके पास एलएसी पर अब बेहतर मारक क्षमता है.

सूत्रों ने बताया कि गोला बारूद के लिए सुरक्षित भूमिगत भंडारण सुविधाएं स्थापित करने के प्रयास भी जारी हैं.

ऊपर उद्धृत सूत्रों में से एक ने कहा, ‘इस तरह भंडारण से यह सुनिश्चित होगा कि सैनिकों को गोला-बारूद की निरंतर आपूर्ति हो और चूंकि वे भूमिगत हैं और इंजीनियरिंग के लिए लिहाज से पूरी तरह सुदृढ़ स्थिति में हैं, इसलिए किसी भी तरह की बमबारी को झेलने में भी समक्ष होंगे.’

भूमिगत और विस्तारित रणनीति को एलएसी तक भी बढ़ाया जा रहा है, जहां सेना ने रक्षात्मक और आक्रामक दोनों अभियानों के लिए एकीकृत क्षेत्रों की स्थापना की है.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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