Sunday, 3 July, 2022
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प्रोजेक्ट डिलीवरी में देरी, चीन से सीखे गए सबक- क्यों रूस-यूक्रेन संकट को लेकर चिंतित है भारतीय रक्षा जगत?

यूक्रेन में छिड़े संघर्ष का तात्कालिक प्रभाव रूस के साथ चलायी जा रही रक्षा परियोजनाओं की डिलीवरी में देरी होगा. लेकिन इसका दीर्घकालीन प्रभाव वह सबक होगा जो चीन इस संघर्ष से सीखता है.

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नई दिल्ली: एक तरफ जहां यूक्रेन के खिलाफ रूसी हमले की वैश्विक स्तर पर की जा रही आलोचना और मॉस्को के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाने जारी हैं, वहीं दिप्रिंट की मिली जानकारी के अनुसार भारतीय रक्षा और सुरक्षा प्रतिष्ठान भी इस सारे घटनाक्रम पर कड़ी नजर रख रहे हैं और इसके तात्कालिक और दीर्घकालिक प्रभाव का आकलन कर रहे हैं.

भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों के अनुसार, इस संकट का तात्कालिक प्रभाव रूस के साथ चल रही रक्षा परियोजनाओं, विशेष रूप से एस-400 ट्रायम्फ वायु रक्षा प्रणाली, जिसकी डिलीवरी (सुपुर्दगी) पिछले साल दिसंबर में ही शुरू हुई थी, में देरी होगा.

मगर, जो चीज भारतीयों को सबसे अधिक चिंतित कर रही है, वह है इस रूसी हमले का दीर्घकालिक प्रभाव, क्योंकि यह न केवल रूसी उपकरणों की खरीद के लिए भारत द्वारा की जाने वाली सौदेबाजी की संभावना को सीमित करेगा, बल्कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर जारी गतिरोध के बीच यह संघर्ष रूस के समर्थक माने जाने चीन को भी अपने खुद के सबक लेने के लिए प्रेरित कर सकता है.

सूत्रों ने कहा कि न केवल रक्षा प्रतिष्ठान बल्कि वित्त, विदेश मामलों और वाणिज्य मामलों के मंत्रालय भी इस सब से चिंतित है. हालांकि, उनका कहना है कि जिस क्षेत्र पर सबसे ज्यादा मार- अल्पकालिक और लम्बी अवधि दोनों में – पड़ सकती है, वह है रक्षा क्षेत्र.

सूत्रों ने कहा कि इस सारे घटनाक्रम पर कड़ी नजर रखी जा रही है और विभिन्न मंत्रालयों के संबंधित लोग भारत पर इसके संभावित प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं.

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रक्षा परियोजनाओं पर प्रतिबंधों की वजह से पड़ने वाला प्रभाव

सूत्रों के अनुसार, भविष्य में कई रक्षा परियोजनाओं को आगे बढ़ाते हुए रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को दरकिनार करना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है. एस-400 परियोजना के बारे में बात करते हुए, सूत्रों ने कहा कि भारत द्वारा एक ‘नॉन पेपर’, जिसमें बताया गया था कि यह रूसी प्रणाली उसके लिए क्यों महत्वपूर्ण है, जारी किये जाने के बाद अमेरिका के साथ एक सामरिक और मौखिक समझ बनी थी.

भारत ने यह भी तर्क दिया था कि यह परियोजना काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सेंक्शंस एक्ट (सीएएटीएसए-कात्सा) के कार्यान्वयन से पहले की है और इसलिए इसे इसके दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए.

अमेरिकी पक्ष अब तक इस मसले पर चुप रहा है, हालांकि तत्कालीन अमेरिकी रक्षा सचिव ने उनके भारत दौरे के समय कहा था कि कात्सा का सवाल तभी आता है जब डिलीवरी शुरू हो जाती है. सूत्रों का मानना है कि अमेरिका अब इस परियोजना की राह में कुछ अड़चनें पैदा कर सकते हैं.

रूस पर लगाए गए द्वितीयक प्रतिबंधों, फ्रांस सहित अन्य देशों द्वारा उस पर नए प्रतिबंधों को थोपे जाने और मॉस्को को अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली, स्विफ्ट, से काटे जाने से भी भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं.

सूत्रों का कहना है कि यह रूस को भारत द्वारा किये जा रहे भुगतान को प्रभावित करेगा. हमें इंतजार करना होगा और देखना होगा कि अन्य देश अब रूस के साथ भारत की वर्तमान में चल रही रक्षा खरीद वाली परियोजनाओं पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं.

एक अन्य परियोजना जिसमें देरी होने की संभावना है वह है भारत में AK 203 राइफल्स के निर्माण के लिए भारत-रूस की संयुक्त परियोजना, जिसके लिए सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं और अंतिम रूप से हस्ताक्षर किये जाने की प्रतीक्षा की जा रही है.

एस -400 के अलावा भारत और रूस के बीच फिलहाल सबसे बड़ा सौदा परमाणु पनडुब्बियों को पट्टे (लीज) पर लेने का है. दोनों देशों ने 2019 में रूस द्वारा भारत को एक परमाणु पनडुब्बी को पट्टे पर देने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और दूसरी पनडुब्बी को पट्टे पर देने के बारे में काम चल रहा है.

इस पनडुब्बी, चक्र III, के 2025 के अंत तक आने की उम्मीद है और यह भारत के समग्र रक्षा परमाणु कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण अंग है.

भारत द्वारा इन रूसी पनडुब्बियों को अपने स्वयं के द्वारा निर्मित किया जा रहे बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों (एसएसबीएन) के बेड़े हेतु अपनी नौसैनिकों को प्रशिक्षित करने के लिए पट्टे पर लिया जा रहा है.

भारत की पहली स्वदेश निर्मित एसएसबीएन, आईएनएस अरिहंत, ने साल 2016 में नौसेना की सेवा में प्रवेश किया था. एक दूसरी पनडुब्बी, आईएनएस अरिघात, फ़िलहाल समुद्री परीक्षणों से गुजर रही है और इसके इस वर्ष सेवा में प्रविष्ट होने उम्मीद है.

दो और एसएसबीएन विशाखापत्तनम में शिप बिल्डिंग सेंटर में निर्माणाधीन हैं.

एक और चल रही परियोजना दो रूस-निर्मित फ्रिगेट की आपूर्ति वाली एक नौसैनिक परियोजना है. सूत्रों ने कहा कि भारत ने इस परियोजना के लिए यूक्रेन से रूस को इनके इंजन भिजवाने का प्रबंध कर लिया था, लेकिन अब रूस के तमाम वादों के बावजूद इसमें देरी हो सकती है.

हालांकि, जो परियोजनाएं अभी बातचीत के चरण में ही हैं, वे सबसे अधिक प्रभावित होंगी क्योंकि भारत को अब वेट एन्ड वाच (प्रतीक्षा करो और देखते रहो) वाले दृष्टिकोण को अपनाना होगा.

इनमें 18 अतिरिक्त सुखोई-30 लड़ाकू विमानों का क्रय आदेश (परचेज ऑर्डर) देने की योजना, लगभग 6,600 करोड़ रुपये में 21 मोथबॉल्ड (गोदाम में रखे गए) मिग-29 की खरीद, कामोव केए-226 लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टरों का संयुक्त उत्पादन और हल्के टैंकों की खरीद जैसी परियोजनाएं शामिल है.

इस बीच दिप्रिंट को पता चला है कि भारत सरकार कामोव हेलीकॉप्टर सौदे के लिए खास इच्छुक नहीं है क्योंकि इसके स्वदेशी विकल्प उपलब्ध हैं.


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चीनियों को लेकर चिंता

रक्षा परियोजनाओं पर पड़ने वाले प्रभाव के अलावा एक और चिंता यह है कि चीन इससे कैसे सबक लेगा और भविष्य में कैसे प्रतिक्रिया देगा, खासकर यह देखते हुए कि वह पहले से ही एलएसी पर भारत के साथ गतिरोध में है.

इस बारे में समझाते हुए एक सूत्र ने कहा, ‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि चीन और रूस एक दूसरे से काफी निकटता से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को अपने भागीदार के रूप में देखते हैं. चीनी, जिनकी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं रूस की तरह ही हैं, इस बात का बारीकी से अनुसरण करेंगे कि अमेरिका और अन्य देश यूक्रेन के इस संकट पर कैसे प्रतिक्रिया दे रहे हैं.’

सूत्रों ने कहा कि चीनियों ने महसूस किया है कि पश्चिमी शक्तियां वास्तविक लड़ाई में यूक्रेन की सहायता के लिए सामने नहीं आई हैं और रूस उनकी गीदड़ भभकी को उजागर करने में कामयाब रहा है. सूत्रों ने कहा कि यह चीनियों के लिए एक प्रोत्साहन के रूप में कार्य करेगा जो ताइवान के एकीकरण की अपनी योजनाओं को देखते हुए और अधिक आक्रामक हो जाएंगे.

एक दूसरे सूत्र ने कहा, ‘अमेरिका अपनी पूरी ताकत चीन पर केंद्रित करना चाहता था लेकिन यूक्रेन के इस संकट ने वाशिंगटन के लिए दो मोर्चे खोल दिए हैं. अब उन्हें एक तरफ चीन और दूसरी तरफ रूस से निपटना होगा.’

एक तीसरे सूत्र ने कहा कि भारत और चीन के बीच किसी भी संभावित संघर्ष के मामले में, अब यह एक पहले से तय बात की तरह है कि रूस भारत के साथ नहीं जाने वाला है, और भले ही वह खुले तौर पर बीजिंग का समर्थन न करे, फिर भी वह तटस्थ रह सकता है.

एक चौथे सूत्र ने कहा, ‘हर किसी को इंतजार करना होगा और देखना होगा कि चीनी हमारे साथ कैसे प्रतिक्रिया करेंगे. क्या वे अधिक आक्रामक होने की कोशिश करेंगे या अब वे एलएसी पर तनाव में कमी लाने (डि-एस्केलेशन) की किसी भी कोशिश को और टालेंगे?’

हालांकि, सूत्रों ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत ने हमेशा अपने दम पर ही अपनी ऑपरेशनल स्ट्रेटेजी (परिचालनात्मक रणनीति) की योजना बनाई है और उसकी सहायता के लिए किसी अन्य देश के आगे आने को ध्यान में नहीं रखा है.

साथ ही, उन्होंने कहा कि यह देखते हुए कि जिस तरह पश्चिमी शक्तियों ने – प्रतिबंध लगाने और कुछ सैन्य उपकरण देने के अलावा- यूक्रेन को अपनी लड़ाई लड़ने के लिए अकेला छोड़ दिया है, भारत द्वारा किसी भी संभावित बाहरी मदद को ध्यान में न रखने की नीति ही सही तरीका है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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