Thursday, 11 August, 2022
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इतिहास के तराज़ू पर सच झूठ का निष्कर्ष निकालने की कोशिश करती पुस्तक ‘ युद्ध में अयोध्या’

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युद्ध में अयोध्या पुस्तक के लेखक हेमंत शर्मा वरिष्ठ पत्रकार है जो अयोध्या से जुड़ी घटनाओं को दशकों से देख रहे है और उसके बारे में लिख भी रहे है.

नई दिल्ली: हेमंत शर्मा का कहना है कि अयोध्या पर अब तक जो कुछ लिखा गया वह अब देखा गया और सुना हुआ यथार्थ था. इस किताब में उनका भोगा हुआ यथार्थ है. अयोध्या का मतलब है जिसे शत्रु जीत न सके. और अयोध्या आज़ाद भारत में कई बहसों का हिस्सा रहा है. और ध्वस्त हुए तीन गुंबद अब भी विवादों की धूरी में है. प्रस्तुत है इस पुस्तक का एक अंश:

इस आग ने पहले अयोध्या को जलाना शुरू किया, फिर दावानल बनकर पूरे देश में फैल गई. यह आग अपने पीछे एक जलता हुआ सवाल छोड़ गई. अयोध्या में राम जन्मभूमि का ताला खुलवाने के पीछे कांग्रेस थी या बीजेपी? राजीव गांधी थे या विश्व हिंदू परिषद? यह सवाल आज भी धधक रहा है. ताला कैसे खुला? उसके पीछे कौन लोग थे? और वे कौन लोग थे, जो अब तक सामने नहीं आए हैं? क्या किसी एक गलती से देश का ध्यान हटाने के लिए तब की सरकार ने दूसरी बड़ी गलती की थी? उस रोज क्या हुआ था? यह अब तक तिलिस्म की तरह है. इतने बड़े फैसले की किसी को कानोकान खबर तक नहीं थी. अगर ताला न खुलता तो विवादित जगह पर शिलान्यास न होता. अगर शिलान्यास न होता तो ढाँचा न गिरता. यानी अयोध्या में ध्वंस की जड़ में था विवादित परिसर का ताला खोला जाना. नफा-नुकसान को तौलकर, एक सोची-समझी राजनीति के तहत ताला खुलवाने का फैसला तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने लिया था. चौंकिए मत, मगर इतिहास का यह कड़वा सत्य है.

यह सब क्यों और कैसे हुआ? इसकी भी बड़ी दिलचस्प कथा है. इस फैसले ने बँटवारे के बाद देश को एक बार फिर से सांप्रदायिक आधार पर बाँट दिया. मजहबी कटुता हमारे भीतर गहरे तक धँस गई. हमने इस दोमुँही राजनीति को नजदीक से देखा. इस घटना ने भारतीय राजनीति और समाज को तनाव के उस मुकाम तक पहुँचा दिया, जहाँ हिंदू और मुसलमान आज भी टकराव के रास्ते पर हैं. दरअसल अयोध्या में ताला खुलवाने का फैसला शाहबानो मामले में हाथ जलाने के बाद बहुसंख्यकों को खुश करने की खातिर राजीव गांधी का एक नासमझी भरा पैंतरा था. मुल्ला-मौलवियों के सामने घुटने टेकती उनकी सरकार के खिलाफ जो देशव्यापी रोष था, उससे ‘फोकस’ हटाने का सरकार को तब यही रास्ता दिखा. जिसकी तार्किक परिणति अयोध्या ध्वंस के रूप में हुई.

वोटबैंक की तात्कालिक राजनीति ने राजीव गांधी से अयोध्या में ताला खुलवा दिया. वे इसके दूरगामी नतीजों से बेखबर थे. इस नाकाम रणनीति से कांग्रेस न इधर की रही न उधर की. मुसलमान ताला खुलने से कांग्रेस से नाराज हुआ और हिंदू मंदिर बनवाने के लिए बीजेपी के पास चला गया. उनके हाथ कुछ नहीं बचा. कांग्रेस आज भी इसी त्रासदी से जूझ रही है.

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क्या आपने कभी सुना है कि आजाद भारत में किसी अदालत के फैसले का पालन महज चालीस मिनट के भीतर हो गया हो? अयोध्या में 1 फरवरी, 1986 को विवादित इमारत का ताला खोलने का आदेश फैजाबाद के जिला जज देते हैं और राज्य सरकार चालीस मिनट के भीतर उसे लागू करा देती है. शाम 4.40 पर अदालत का फैसला आया. 5.20 पर विवादित इमारत का ताला खुल गया. अदालत में ताला खुलवाने की अर्जी लगाने वाले वकील उमेश चंद्र पांडेय भी कहते हैं, “हमें इस बात का अंदाजा नहीं था कि सब कुछ इतनी जल्दी हो जाएगा.”

दूरदर्शन की टीम ताला खुलने की पूरी प्रक्रिया कवर करने के लिए वहाँ पहले से मौजूद थी. तब दूरदर्शन के अलावा देश भर कोई और समाचार चैनल नहीं था. इस कार्रवाई को दूरदर्शन से उसी शाम पूरे देश में दिखाया गया. उस वक्त फैजाबाद में दूरदर्शन का केंद्र नहीं था. कैमरा टीम लखनऊ से गई थी. लखनऊ से फैजाबाद जाने में तीन घंटे लगते हैं. यानी कैमरा टीम पहले से भेजी गई थी. इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा दिल्ली में लिखी गई थी. अयोध्या में तो सिर्फ किरदार थे. इतनी बड़ी योजना फैजाबाद में घट रही थी, पर उत्तर प्रदेश सरकार को इसकी कोई भनक नहीं थी….’’

दिप्रिंट ने हेमंत शर्मा से पूछा कि अयोध्या पर कई शोधरपरक किताबें आईं है- तो उनकी किताब की क्या विशेषता है. वे कहते है कि ये किताब कही सुनी की बजाए स्वयं देखी बातों पर आधारित है.

6 दिसंबर को जब कार सेवकों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद के गुंबदों को ढ़हा दिया – क्या वो सब पूर्वनियोजित था या फिर भीड़ पर उसका नेतृत्व काबू न कर सका—हेमंत शर्मा का कहना है कि उस दिन बात सबके हाथ से निकल गई.

युद्ध में अयोध्या में वे लिखते है:

“मैं विवादित इमारत से कोई सौ गज दूर खड़ा था. सन्न और अवाक्! समझ नहीं आ रहा था कि मैं जो देख रहा हूँ, वह हकीकत है या बुरा सपना. चारों तरफ बदला! प्रतिशोध!! प्रतिहिंसा का हुंकारा!!! सबकुछ अचानक हुआ. कारसेवक बाबरी ढाँचे पर चढ़ चुके थे. पुलिस प्रशासन को काटो तो खून नहीं. किंकर्तव्यविमूढ़, बेबस और लाचार. मैंने पुलिसबलों का ऐसा गांधीवादी चेहरा पहली बार देखा. 46 एकड़ का पूरा इलाका ध्वंस के जुनून में था. समूचा दृश्य दिल दहलाने वाला था. कोई दो सौ कारसेवक विवादित इमारत के तीनों गुंबदों पर चढ़ लोहे के राड, गैंते और सरियों से चोट कर रहे थे. नीचे कोई एक लाख कारसेवकों ने इमारत को घेर रखा था.

उस रोज मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम पर हर कोई अमर्यादित था. एक-एक कर तीनों गुंबद टूटे और उखड़ गई हिंदू समाज की विश्वसनीयता, वचनबद्धता और उत्तरदायित्व की जड़ें!

एक तरफ ध्वंस के उन्माद में कारसेवक और दूसरी ओर हैरान, सन्न-अवाक् विश्व हिंदू परिषद व बीजेपी नेता. बूझ नहीं पड़ा कि यह सब अचानक कैसे हुआ? कहीं यह पूर्व नियोजित तो नहीं? ध्वंस की धूल और उसके गुबार ने हमारी गंगा-जमुनी तहजीब को ढक लिया था. छह दिसंबर नफरत और धार्मिक हिंसा के इतिहास से जुड़ गया. मेरे सामने सिर्फ साढ़े चार सौ साल पुराना बाबरी ढाँचा नहीं टूट रहा था बल्कि विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका की मर्यादाएँ भी टूट रही थीं. 6 दिसंबर को गीता जयंती थी. द्वापर में इसी रोज महाभारत हुआ था. एक नया महाभारत मेरे सामने घट रहा था….“

सुनिए 6 दिसंबर की घटना का आंकलन हेमंत शर्मा की ज़ुबानी:

आलोचक नामवर सिंह लिखते हैं, “मंदिर बने न बने, यह राम जाने!…राम और उनकी जन्मभूमि पर ऐसी प्रामाणिक पुस्तक पहले कभी नहीं आई… ” पुस्तक का हाल में विमोचन दिल्ली में हुआ जिसमें सरसंधचालक, मोहन भागवत, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई हस्तियों ने हिस्सा लिया.

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