श्रीलाल शुक्ल. (फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स)
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आपने हिंदी साहित्य की सबसे उत्कृष्ट किताब राग दरबारी पढ़ी है? अगर नहीं भी पढ़ी तो उसको जिया जरूर होगा. आप पिछले 70 सालों में भारत में कभी भी और कहीं भी पैदा हुए हों, राग दरबारी में लिखी बातों को आपने अनुभव जरूर किया होगा. आज इस कालजयी रचना के कलमवीर श्रीलाल शुक्ल का जन्मदिन है.

शुरुआती जीवन

साल था 1925. हमारा देश अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ रहा था. उसी साल यूपी के लखनऊ से सटे अतरौली गांव में एक लड़के का जन्म होता है. तब देश में राष्ट्रवादी कवियों और लेखकों की एक खेप अपनी लेखनी से लोगों के मन में देशभक्ति का भाव ओत-प्रोत कर रही थी. अध्यापक पिता के घर जन्मा यह युवक अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करके, ग्रेजुएशन करने पूरब के आक्सफोर्ड और आईएएस-पीसीएस की तैयारी का गढ़ माने जाने वाले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी चला आता है. देश 1947 में आजाद होता है और इसी साल श्रीलाल शुक्ल की पढ़ाई पूरी होती है.

इसके दो साल बाद ही वे राज्य की सिविल सेवा (पीसीएस) में चयनित होते हैं. वह दौर था कई सदियों की गुलामी से आजाद हुए देश में व्यवस्था निर्माण का. एक सिस्टम के बनने का. उसके खड़ा होने का. श्रीलाल शुक्ल इस सिस्टम को अंदर से देखते हैं. गुलाम भारत के लगभग 20 साल के अनुभव और आजाद भारत के एक सिस्टम में रहकर काम करते हुए बिताए पांच साल के अनुभवों को वह नौजवान पन्नों पर उतारना शुरू करता है.

राग दरबारी ने एक नए मुकाम पर पहुंचाया

साल था 1954. यहीं से उनकी लेखनी शुरू होती है और यहीं से शुरू होता है हिंदी साहित्य में व्यंग की परंपरा का एक शानदार अध्याय. अपने पहले व्यंग उपन्यास ‘अंगद का पांव’ में निबंधों के संग्रह के माध्यम से वे दुनिया के प्रति अपने नजरिए को बताते हैं. इसके बाद 1968 में अपने उपन्यास ‘राग दरबारी’ से वे समाज और सिस्टम के बीच बनने वाली खाई को व्यापक रूप से उकेरते हैं.

‘राग दरबारी’ की कहानी हमारे देश के ग्रामीण जीवन की सच्चाई को परत दर परत खोलती है. आज से ठीक पचास साल पहले छपी इस उपन्यास की एक-एक बात आज भी प्रासंगिक है. पहले साल इसकी लगभग 2200 प्रतियां बिकी थीं और अब तक इस किताब की लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं. अपने प्रकाशन के पहले ही साल में इस किताब को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला था.

दोस्त किस तरह याद करते हैं

साहित्य अकादेमी में भारतीय भाषाओं के अतिथि संपादक रह चुके जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर रंजीत साहा बताते हैं, श्रीलाल शुक्ल चाहते थे कि इस किताब का अनुवाद दूसरी भाषा में भी कराया जाए, लेकिन मैंने उनसे कहा कि इतने श्रेष्ठ व्यंग का अनुवाद दूसरी भाषा में संभव नहीं है. अन्य भाषाओं में वे साहित्यिक चीजें नहीं मिलेंगी जो इसके मूल में हैं. बाद में इसका अनुवाद बांग्ला में भी हुआ, लेकिन वह इतना चला नहीं. हमें समझना होगा कि इस विधा की एक सीमा है.

राग दरबारी को साहित्य अकादमी पुरस्कार भले ही पहले साल मिल गया हो, लेकिन ज्ञानपीठ मिलने में इसे 49 साल लग गए. ऐसा बताया जाता है कि श्रीलाल शुक्ल के मित्र और हिंदी के प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह शुक्ल जी को ज्ञानपीठ देरी से मिलने से बहुत नाराज हुए थे. उन्होंने तो यहां तक कह डाला था कि ज्ञानपीठ को इस देरी के लिए पश्चाताप करना होगा.

25 किताबें लिखने वाले श्रीलाल शुक्ल को 2008 में भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण भी प्रदान किया गया. जिस समय भीष्म साहनी साहित्य अकादेमी के संयोजक थे, उस दौरान श्रीलाल शुक्ल हिंदी सलाहकार मंडल के सदस्य थे. ऐसे में उनका साहित्य अकादमी आना जाना लगा रहता था.

उनके व्यक्तित्व के बारे में बताते हुए रंजीत कहते हैं, ‘मैं उनसे 22 साल छोटा था लेकिन उनके साथ बातचीत करने पर कभी भी उम्र के इस अंतर की भनक नहीं लगी. साल 1999 में हम लोग 6वें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिस्सा लेने लंदन गए थे. वहां मैं और केदारनाथ एक कमरे में रुके थे और शुक्ला जी और नामवर जी एक कमरे में. शुक्ल जी और नामवर जी मेरे कमरे में आए और हम लोगों ने खूब मस्ती की. हंसी ठिठोली रात भर चलती रही. मैं और श्रीलाल शुक्ल उसी दौरान बीबीसी लंदन के बुश हाउस गए थे. वहां हम लोग दिनभर रहते थे. खूब सिगरेट पी.’

रंजीत आगे बताते हैं, ‘वे वक्त के पाबंद थे. दफ्तर में गंभीर रूप में आते थे. उनके लेखन शैली में पांडित्यपूर्ण वाग्मिता थी. कालिदास से लेकर उपनिषदों का उन्होंने बड़ा गहरा अधय्यन किया था.’

28 अक्टूबर 2011 को इस दुनिया से अपना प्राण त्यागने वाले श्रीलाल शुक्ल के विचार आज भी जिंदा हैं. उनके व्यंग्य जितने मार्मिक हैं, उतने ही चुटीले ढंग से व्यवस्था पर चोट करते हैं. हिंदी साहित्य के आलोचकों का मानना है कि श्रीलाल शुक्ल ने जो कुछ भी लिखा, संयंमित होकर लिखा और अपने पाठकों से अपेक्षा की कि वे तंज को समझें. अंत में राग दरबारी की एक लाइन पढ़िए: वास्तव में सच्चे हिंदुस्तानी की यही परिभाषा है कि वह इंसान जो कहीं भी पान खाने का इंतजाम कर ले और कहीं भी पेशाब करने की जगह ढ़ूंढ ले.


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