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प्रेमचंद ऐसे देश और समाज की कल्पना करते थे जिसमें किसानों, मजदूरों, दलितों और गरीबों के लिए जगह हो.

कोई ऐसा लेखक जिसे दादा ने भी पढ़ा हो, पिता ने भी पढ़ा हो, बेटे ने भी पढ़ा हो और वह अपने बेटे को भी पढ़ा रहा हो, यानी जो पीढ़ियों को पार कर जाए, ऐसे लेखक को ही कालजयी लेखक कहते होंगे. हिंदी के पहले उपन्यासकार और कहानीकार प्रेमचंद ऐसे ही कालजयी लेखक हैं, जिन्होंने पीढ़ियों और समय की सीमाओं को पार कर लिया और आज तक हिंदी साहित्य में निर्विवाद रूप से शीर्ष पर बने हुए हैं.

अगर ज़िंदगी के संघर्ष और मुसीबतों को कागज़ पर उकेरा जा सकता है, तो भारतीय साहित्यकारों में प्रेमचंद इसकी मिसाल हैं. अगर गरीबों, पिछड़ों और दलितों के जीवन को बुलंद आवाज़ दी जा सकती है तो यह काम हिंदी साहित्य में सबसे पहले प्रेमचंद ने शुरू किया. साहित्य में आज़ादी के लिए आवाज़, प्रगतिशीलता, उपनिवेशवाद का विरोध, ब्राह्मणवाद और सामंती समाज का विरोध, जातिवाद और छुआछूत का विरोध करने की परंपरा का आगाज़ करने वाले हिंदी के पहले उपन्यासकार प्रेमचंद हैं. प्रेमचंद ने भारतीय समाज के नंगे सच को अपने उपन्यासों और कहानियों में इस तरह उकेरा कि दुनिया चकित रह गई.

वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह प्रेमचंद को पहला प्रगतिशील लेखक कहते हैं. प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्ष भी हुए थे. अपने एक लेख में वे लिखते हैं, ‘प्रेमचंद ने 1930 के आसपास कहा था कि जो कुछ लिख रहे हैं वह स्वराज के लिए लिख रहे हैं. उपनिवेशवादी शासन से भारत को मुक्त करने के लिए. केवल जॉन की जगह गोविंद को बैठा देना ही स्वराज्य नहीं है बल्कि सामाजिक स्वाधीनता भी होना चाहिए…सामाजिक स्वाधीनता से उनका तात्पर्य सांप्रदायवाद, जातिवाद, छूआछूत और स्त्रियों की स्वाधीनता से भी था.’

प्रेमचंद की रचनाओं में विभिन्न तरह के संघर्ष हैं. ज़मींदार के ख़िलाफ़ साधारण और गरीब किसानों की लड़ाई, सवर्णों के खिलाफ़ दबे कुचले लोगों की लड़ाई, गुलामी के विरुद्ध आज़ादी की लड़ाई, पुरुष के खिलाफ़ प्रताड़ित स्त्री की लड़ाई. वे बुनियादी परिवर्तन को आधार बनाकर लिखते रहे ताकि समाज में एक आमूलचूल परिवर्तन हो सके. प्रेमचंद के जैसा व्यापक फलक पर सोचने और लिखने वाला लेखक प्रेमचंद के बाद और प्रेमचंद के पहले कोई और नहीं हुआ.

संघर्ष और गरीबी का जीवन

प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई, 1880 को बनारस के पास के गांव लमही में हुआ था. बचपन में ही उनके सिर से मां का साया उठ गया था. 15 साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गई और इसके कुछ ही समय बाद पिता का भी देहांत हो गया. प्रेमचंद के पिता डाकघर में मामूली नौकर का काम करते थे. वे भयंकर गरीबी में पले बढ़े थे.

प्रेमचंद को अपनी आर्थिक परेशानियों से निपटने के लिए अपनी कोट और किताबें आदि बेचनी पड़ी थीं. बताते हैं कि एक बार जब वे आर्थिक रूप से परेशान थे, अपनी सारी किताबें लेकर एक किताब की दुकान पर पहुंचे. वहां उनकी मुलाकात एक स्कूल के हेडमास्टर से हुई. उन्होंने प्रेमचंद को स्कूल में अध्यापक नियुक्त करवा दिया.

उनके बचपन का नाम धनपतराय था. वे नवाबराय के नाम से कहानियां लिखते थे. 1907 में प्रेमचंद की पांच कहानियों का संग्रह सोज़े-वतन प्रकाशित हुआ. देशप्रेम और आम जनता के दर्द से सराबोर इन कहानियों को अंग्रेज़ सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया और उनके लिखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इसके बाद वे नाम बदल कर प्रेमचंद के उपनाम से लिखने लगे.

प्रेमचंद ने कुल 12 उपन्यास और 300 से अधिक कहानियां लिखीं. उनका समग्र लेखन ग्रामीण पृष्ठभूमि पर है जिसमें गांव, गरीब, किसान, दलित और दबे कुचले वर्ग के लोगों का जीवन रचा गया है.

गंगा-जमुनी तहजीब

प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में एक ऐसी नई भाषा गढ़ी थी जो खांटी संस्कृतनिष्ठ हिंदी की जगह उर्दू और संस्कृत से बनी वास्तव में हिंदुस्तान की भाषा है. प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास भी ऐसे हैं जिसमें ये हिंदू मुस्लिम समाज की मिली जुली संस्कृति की झलक मिलती है.

वरिष्ठ आलोचक और हंस के संपादक राजेंद्र यादव का कहना था, ‘प्रेमचंद उर्दू की पृष्ठभूमि से आए थे तो उनके साथ सिर्फ़ दो भाषाएं ही नहीं थी, दो सांस्कृतिक परंपराएं भी थीं. संस्कृतियों का एक सम्मिलित रूप था. उदार और मानवतावादी संस्कृतियां उनकी पूंजी थीं. जिसे हम प्रेमचंद की प्रगतिशीलता कहते हैं. जो दबे, कुचले, शोषित वर्ग हैं जिनकी आवाज़ कोई नहीं सुनता था, जिनके बारे में कोई नहीं बोलता था उन्होंने उसके बारे में लिखना शुरू किया.’

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आशुतोष कुमार भी कहते हैं, ‘प्रेमचंद के साहित्य में सबसे ज़्यादा झलकता है ब्राह्मणवाद और सामाजिक अन्याय का विरोध. चाहे वह गोदान उपन्यास हो, या सदगति, दूध का दाम या मोटेराम जैसी कहानियां हों. उनके लेखन में गंगा जमुनी संस्कृति बहुत मुखर रूप से दिखाई देती है, जहां हिंदू मुस्लिम समाज में कोई दरार नहीं दिखती.’

सांप्रदायिकता का विरोध

‘सांप्रदायिकता सरकार का सबसे बड़ा अस्त्र है और वह आखिर दम तक इस हथियार को हाथ से न छोड़ेगी.’ प्रेमचंद ने यह पंक्ति अंग्रेज़ी शासन के लिए लिखी थी. वे यह अच्छी तरह समझते थे कि सांप्रदायिकता जनता को बांटने का एक कारगर हथियार है. इसीलिए उन्होंने कहा कि ‘सरकार ने भारत में सांप्रदायिकता का बीज बो दिया है और किसी दिन इस वृक्ष का फल भारत और भारतीय सरकार दोनों के लिए घातक साबित होगा.’ ऐसा हुआ भी. यह सांप्रदायिकता ही देश के विभाजन का कारण बनी.

प्रेमचंद ने बहुत से वैचारिक लेख लिखे और राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता, उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद पर बेबाक राय रखी. उन्होंने लिखा, ‘सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है. उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है. हालांकि, संस्कृति का धर्म से कोई संबंध नहीं है.’

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं, ‘जब प्रेमचंद ऐसा लिख रहे थे तब वे एक चेतावनी दे रहे थे. नब्बे साल पहले दी गई उस चेतावनी को इस देश के लोगों ने सुना नहीं. उसका नतीजा है कि अब वह हमारी गर्दन पर चढ़ बैठी है.’

‘सांप्रदायिकता और संस्कृति’ (1934) शीर्षक से अपने लेख में संस्कृति के बहाने धर्म के झगड़ों पर चर्चा करते हुए प्रेमचंद लिखते हैं, ‘हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना ज़ोर बांध रही है. वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखंड.’

प्रेमचंद को अल्बेयर कामू और जॉर्ज आॅरवेल के समकक्ष रखते हुए अपूर्वानंदकहते हैं, ‘प्रेमचंद हों, जॉर्ज आॅरवेल हों, अल्बेयर कामू हों या हजारी प्रसाद द्विवेदी हों, उनकी प्रासंगिकता यही है कि उन्होंने इन लक्षणों को बहुत पहले पहचान लिया था. और लोगों को बहुत स्पष्ट रूप से बताया भी था. जो लोग सांप्रदायिक शक्तियों को लेकर बहुत उत्साहित रहते हैं, उन्हें प्रेमचंद को पढ़ना चाहिए. अगर सांप्रदायिक सोच के लोग यह मानते हैं कि प्रेमचंद बहुत महान लेखक थे तो उन्हें प्रेमचंद के विचारों पर भी सोचने की ज़रूरत पड़ेगी.’

जैसा कि उनके साहित्य से इतर लेखन से स्पष्ट है कि वे सांप्रदायिकता के घोर आलोचक हैं, यह विचार उनकी रचनाओं में भी दिखता है. अपनी कहानियों और उपन्यासों में प्रेमचंद ने धार्मिक एकता की नायाब नज़ीरें पेश कीं.

प्रेमचंद और राष्ट्रवाद

प्रेमचंद अपने लेखों के ज़रिये भारत में राष्ट्रवाद को लेकर चल रही बहस में भी शरीक हुए. रवींद्रनाथ टैगोर मानते थे कि आधुनिक राष्ट्रवाद की अवधारणा में संकीर्णता की भावना निहित है. प्रेमचंद भी इसी विचार के साथ खड़े हुए. वे उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में राष्ट्रवाद की भूमिका की तरफदारी करते हुए भी पश्चिमी राष्ट्रवाद और उसके अंतर्विरोधों के आलोचक थे.

वे लिखते हैं, ‘वर्तमान राष्ट्र यूरोप की ईजाद है… इसी राष्ट्रवाद ने साम्राज्यवाद, व्यवसायवाद आदि को जन्म देकर संसार में तहलका मचा रखा है. व्यापारिक प्रभुत्व के लिए महान युद्ध होते हैं. यह सारे अनर्थ इसलिए हो रहे हैं कि धन और भूमि की तृष्णा ने राष्ट्रों को चक्षुहीन सा कर दिया है. ऊंचा और पवित्र आदर्श इस राष्ट्रवाद के हाथों ऐसा कुचला गया कि अब उसका कहीं चिह्न भी नहीं रहा.’

अपूर्वानंद कहते हैं कि प्रेमचंद ने राष्ट्रवाद को कोढ़ कहा था. वे राष्ट्रवाद के घोर आलोचक रहे. जितनी बेबाकी से उन्होंने उस समय लिखा, आज का समय ऐसा है कि कोई लेखक राष्ट्रवाद को कोढ़ बता दे तो मुमकिन है कि वह जेल में पहुंच जाए.

प्रेमचंद्र आज़ादी की लड़ाई में एकजुटता के लिए राष्ट्रवाद की भूमिका को महत्व दे रहे थे, लेकिन आज़ाद भारत में ऐसा राष्ट्रवाद चाहते थे जो गरीबों, किसानों और मजदूरों का हिमायती हो. उन्होंने लिखा, ‘डेमोक्रेसी केवल एक दलबंदी बन कर रह गई. जिसके पास धन था, जिनकी जबान में जादू था, जो जनता को सब्जबाग दिखा सकते थे, उन्होंने डेमोक्रेसी की आड़ में सारी शक्ति अपने हाथ में कर ली.’

वे चाहते थे कि ‘संसार का कल्याण तभी हो सकता है जब संकुचित राष्ट्रीयता का भाव छोड़ कर व्यापक अंतर्राष्ट्रीय भाव से विचार हो…राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्ण व्यवस्था, ऊंच नीच के भेद और धार्मिक पाखंड की जड़ खोदना है.’

अपने राष्ट्र की कल्पना करते हुए प्रेमचंद लिखते हैं, ‘हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें जन्मगत वर्णों की तो गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय. उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन…हमारा स्वराज केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है, बल्कि सामाजिक जुए से भी, इस पाखंडी जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है.’

क्या भारत जाति, धर्म और शोषण से मुक्त प्रेमचंद के सपनों का समाज बन सका? दुर्भाग्य से कहना होगा कि नहीं. वे स्वप्न अब भी अधूरे हैं.


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