scorecardresearch
Thursday, 18 July, 2024
होमसमाज-संस्कृतिक्रिस्टोफर रिव्यू: मामूट्टी की कॉप थ्रिलर में कोई ख़ास मज़ा नहीं है, बस कैरेक्टर्स की एक लंबी लिस्ट है

क्रिस्टोफर रिव्यू: मामूट्टी की कॉप थ्रिलर में कोई ख़ास मज़ा नहीं है, बस कैरेक्टर्स की एक लंबी लिस्ट है

एक ऐसी फिल्म, जिसमें महिलाओं को न्याय से वंचित करना उसका मुख्य विषय है, उसमें क्रिस्टोफर उनके अस्तित्व के प्रति असभ्य व्यवहार करता है.

Text Size:

कानून को अपने हाथ में लेने की अवधारणा को कई फिल्मों में फिर से दिखाया गया है. मामूट्टी की क्रिस्टोफर फिल्म, निर्देशक बी. उन्नीकृष्णन का लेखक उदयकृष्ण के साथ दूसरा कोलैबोरेशन, उस संबंध में अलग नहीं है.

क्रिस्टोफर एक एक्शन थ्रिलर है जो ‘एक सतर्क पुलिस वाले की जीवनी’ को दस्तावेजीकरण करने का दावा करती है. लेकिन भयावह मुठभेड़ हत्याओं को ग्राफिक रूप में परेशान करने वाले तरीके से फिल्माया गया है जिसे देखना चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है.

मामूट्टी, जो क्रिस्टोफर नाम के एक पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाते हैं, किसी को भी अचानक गोली मार देते हैं क्योंकि उनका मानना है कि सिस्टम त्रुटिपूर्ण है और बड़े पैमाने पर बदलाव की जरूरत है. वह एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट हैं, जो महिलाओं के खिलाफ अपराध की रोकथाम विभाग (डीपीसीएडब्लू) के प्रमुख भी हैं. हर बार जब उन्हें लगता है कि यौन उत्पीड़न के आरोपी व्यक्ति को सजा नहीं मिलेगी, तो वह मोर्चा संभालते हैं और उन्हें मार गिराते हैं. फिल्म के शरूआत के आधे घंटे के भीतर, वह एक महिला के साथ बलात्कार और हत्या के आरोपी चार युवकों को गोली मार देते हैं. इसके तुरंत बाद, ‘मुठभेड़’ की जांच के लिए एक समिति गठित की जाती है.

अधिकांश फ्रेम, चाहे प्लॉट की आवश्यकता हो या नहीं, मामूट्टी पर केंद्रित हैं. कई निर्देशक अपने प्रमुख पुरुषों के स्टारडम के शिकार हो जाते हैं और उन्नीकृष्णन इसी तरह दिग्गज स्टार पर भरोसा करते हैं, भले ही कहानी खिड़की से बाहर फेंक दी गई हो.

जहां फिल्म का पहला भाग एक अच्छे थ्रिलर की झलक पेश करता है, वहीं दूसरा भाग काफी हद तक अनुमानित है. यह अभी भी ठीक होता अगर कहानी पूरी तरह से औसत दर्जे की नहीं होती और क्रियान्वयन घटिया होता.

महिला कैरेक्टर- आईपीएस अधिकारी सुलेखा (अमाला पॉल), कार्यकर्ता अमीना (ऐश्वर्या लक्ष्मी), और गृह सचिव बीना (स्नेहा) – टोकन सेवा के लिए कम हो जाती हैं. क्रिस्टोफर महिलाओं का आदमी है, वो ऐसा नहीं है जो महिला पात्रों को चमकने में मदद करता है. चरित्र-चित्रण को भूल जाइए, फिल्म उन्हें पहला मौका मिलने पर उनसे छुटकारा पा लेती है. एक ऐसी फिल्म, जिसमें महिलाओं को न्याय से वंचित करना उसका मुख्य विषय है, उसमें क्रिस्टोफर उनके अस्तित्व के प्रति असभ्य व्यवहार करता है.

महिलाओं के खिलाफ अपराध और कस्टडी में हत्याएं फिल्म का एक सतत खाका है. एक पड़ाव के बाद, आप मुठभेड़ों की संख्या का ट्रैक खो सकते हैं. लेकिन पलक झपकते ही इस तरह के चरम उपाय करने की प्रेरणा अंत तक अस्पष्ट रहती है.

मलयालम सुपरस्टार की पिछली रिलीज़ – रोर्स्चच् और नानपकल नेराथु मयक्कम – के अनुसार मामूट्टी ने अप्रत्याशित और रोमांचक कहानियों के साथ अपने प्रशंसकों को चौंकाने की आदत विकसित की है। लेकिन क्रिस्टोफर वह मजेदार सरप्राइज नहीं है जिसकी कोई उम्मीद करेगा.


यह भी पढ़ें: अगले 10 साल में भारत 6.5% की आर्थिक वृद्धि तभी हासिल कर सकता है जब कुछ प्रमुख नीतिगत बदलाव करे


 

share & View comments