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जम्मू कश्मीर में 2009 में हुए चुनाव में वोट डालता एक आम आदमी | कामंस
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नई दिल्ली: जम्मू कश्मीर में एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव नहीं कराने के मद्देनजर चुनाव आयोग को विपक्षी पार्टियों द्वारा कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी है. हालांकि, गृह मंत्रालय ने चुनाव आयोग को लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद ही विधानसभा चुनाव कराने का सुझाव दिया है. 14 फरवरी को पुलवामा हमले के बाद चुनाव आयोग को लिखे एक पत्र में गृह मंत्रालय ने कहा था कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में प्रत्याशियों की बढ़ती संख्या और सुरक्षाकर्मियों की भारी डिमांड के कारण घाटी में दोनों चुनाव एक साथ कराना ठीक नहीं होगा.

जम्मू कश्मीर में 6 लोकसभा और 87 विधानसभा सीटे हैं. 2014 में 77 प्रत्याशियों ने विधानसभा और 839 कैंडिडेट ने लोकसभा चुनाव में भाग लिया था. गृह मंत्रालय ने 26 फरवरी को लिखे पत्र में कहा था कि लोकसभा चुनाव को पांच चरण में संपन्न कराया जाए और उसके तुरंत बाद 7 चरणों में विधानसभा चुनाव कराई जाए.


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पत्र में चुनाव की तारीखों पर अंतिम मुहर लगाने से पहले रमजान के महीने और अमरनाथ यात्रा का भी ध्यान रखने को कहा था. रविवार को चुनाव आयोग ने जैसा कि पहले सुझाया गया था राज्य में पांच चरणों में लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की थी. आयोग ने सुरक्षा कारणों के चलते दोनों चुनाव एक साथ नहीं कराने का फैसला लिया है. मंत्रालय, चुनाव आयोग द्वारा लिखे पत्र जिसमें आचार संहिता और सुरक्षा बलों की मांग संबंधित है, पर जवाब दे रहा था.

सुरक्षा स्थिति

गृह मंत्रालय ने अपने पत्र में कहा है कि जम्मू कश्मीर में सुरक्षा बलों की नियुक्ति विधानसभा चुनावों तक बढ़ाई जाए. राज्य सरकार द्वारा फरवरी में हुई एक जांच, जो कि गृह मंत्रालय द्वारा कराई गई थी, के बाद यह सामने आया कि लोकसभा चुनाव के लिए केंद्रीय सुरक्षा बलों की 520 कंपनियों की जरूरत पड़ेगी. वहीं विधानसभा चुनावों के लिए 110 अतिरिक्त कंपनियों की आवश्यकता है. हर कंपनी में 100 सुरक्षा बल के कर्मी होंगे.

28 दिसंबर को गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में दिए एक भाषण में कहा था कि चुनाव शांतिपूर्ण संपन्न कराने के लिए चुनाव आयोग को जितने सुरक्षाबलों की आवश्यकता होगी केंद्र सरकार उनकी पूरी आपूर्ति करेगी. हालांकि पुलवामा हमले के बाद हुई घटनाओं से ऐसा लग रहा है कि गृह मंत्रालय का स्टैंड मुद्दे से भटका है.


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क्यों आम चुनाव के तुरंत बाद विस चुनाव कराना चाहिए

जम्मू व कश्मीर में पिछले दिसंबर से राष्ट्रपति शासन लागू है. सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के अनुसार नियमत: चुनाव आयोग को 6 महीने बाद चुनाव करा देने चाहिए. एक बार विधानसभा भंग होने के बाद नए सदन का गठन 6 महीने के भीतर हो जाना चाहिए. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार अगर राज्य की सुरक्षा व्यवस्था ठीक नहीं हो तो चुनाव को 6 महीने से आगे भी बढ़ाया जा सकता है. अगर मई में लोकसभा चुनाव के बाद सुरक्षा स्थिति में कोई दिक्कत नहीं हुई तो जम्मू और कश्मीर में चुनाव संपन्न कराए जा सकते हैं. चुनाव की घोषणा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा कि एक तीन सदस्यों की टीम को प्रवेक्षक के तौर पर जम्मू कश्मीर की सुरक्षा स्थिति का जायजा लेने के लिए भेजा जाएगा.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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