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बीजेपी की पार्लियामेंट्री मीटिंग के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह | पीटीआई
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नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भले ही अपने नेताओं को फलने-फूलने का मौका देने वाली कैडर आधारित पार्टी होने का दावा करती हो, लेकिन जिन राज्यों में यह सत्ता में है वहां इसके एक चौथाई से अधिक मंत्री गैर-भाजपा पृष्ठभूमि के हैं, जो विरोधी पार्टियों से दलबदल कर भाजपा में आए हैं.

अन्य दलों के बागियों को पार्टी में शामिल करने की भाजपा की आतुरता के कारण हालात ये हो गई है कि दलबदल कर आए कई नेताओं को 24 घंटे के भीतर कैबिनेट मंत्री तक बना दिया जाता है. गुजरात में जवाहर चावड़ा इसके ताज़ा उदाहरण हैं.

दिप्रिंट ने भाजपा शासन वाले राज्यों के सारे भाजपाई मंत्रियों – कैबिनेट और राज्यमंत्री दोनों ही – का विस्तृत विश्लेषण किया तो उनमें से 29 प्रतिशत तक गैर-भाजपाई मूल के पाए गए. पूर्वोत्तर के राज्यों में ऐसा अधिक पाया गया.


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इस समय इन 12 राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री हैं: अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, मणिपुर, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड. इन राज्यों के कुल 180 मंत्रियों में 53 ऐसे हैं जिन्होंने अपना राजनीतिक सफर अन्य दलों में शुरू किया था.

इस विश्लेषण के लिए हमने सिर्फ उन्हीं राज्यों को चुना है जहां मुख्यमंत्री भाजपा के हैं, बिहार जैसे राज्यों को इससे अलग रखा गया है जहां कि भाजपा की हैसियत सरकार में एक जूनियर सहभागी की है. साथ ही, अध्ययन को सिर्फ भाजपा के मंत्रियों पर ही केंद्रित रखा गया है, और सहयोगी दलों के मंत्रियों को इसमें शामिल नहीं किया गया है. मंत्रियों में संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल हैं.

विश्लेषण से पता चलता है कि महाराष्ट्र को छोड़कर, बाकी हर राज्य में कम-से-कम एक मंत्री दूसरी पार्टी से बगावत कर भाजपा में आया नेता है.

हिंदी पट्टी के राज्य

दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को हिंदी पट्टी के तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सत्ता कांग्रेस के हाथों गंवानी पड़ी थी, लेकिन पार्टी इस क्षेत्र के हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में सत्ता में कायम है.

हरियाणा में, नौ कैबिनेट मंत्रियों और तीन राज्यमंत्रियों में से तीन अन्य पार्टियों से आए नेता हैं. राव नरवीर सिंह भाजपा में शामिल होने से पहले हरियाणा जनहित कांग्रेस में थे; बनवारी लाल फरवरी 2014 में कांग्रेस छोड़कर आए थे, जबकि कृष्णलाल पंवार सितंबर 2014 में भारतीय राष्ट्रीय लोक दल से भाजपा में शामिल हुए थे.

उत्तराखंड में ऐसे मंत्रियों की संख्या और भी बड़ी है. इनमें सतपाल महाराज, हरक सिंह रावत और यशपाल आर्य जैसे प्रमुख नेता शामिल हैं.

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा – प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र – ने उत्तराखंड में एक राजनीतिक बगावत की अगुआई की थी जो कि 2016 में राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के विभाजन का कारण बनी. इसके बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस में शीर्ष पर रही उनकी बहन रीता बहुगुणा ने भी भाजपा का रुख कर लिया. वह इस समय योगी आदित्यनाथ सरकार के गैर-भाजपाई पृष्ठभूमि वाले नौ कैबिनेट मंत्रियों में से एक हैं.

उत्तर प्रदेश में इस श्रेणी के अन्य मंत्रियों में 2016 में बहुजन समाज पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य और एसपी सिंह बघेल, और समाजवादी पार्टी को अलविदा कहकर भाजपा में आए अनिल राजभर शामिल हैं. उत्तर प्रदेश में भाजपा के 25 कैबिनेट मंत्री, नौ स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री और 13 राज्यमंत्री हैं.


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पूर्वोत्तर

यह ऐसा क्षेत्र है जहां परंपरागत रूप से भाजपा की मज़बूत उपस्थिति नहीं रही थी, पर केंद्र में 2014 में सत्ता में आते ही पार्टी ने धीरे-धीरे यहां अपनी पकड़ बनानी शुरू की, और इस समय पूर्वोत्तर के सात में से छह राज्यों में पार्टी या तो अपने दम पर या फिर गठबंधन के साथ सत्ता में है.

हालांकि, क्षेत्र में संगठनात्मक मौजूदगी के अभाव में भाजपा ने प्रतिद्वंद्वी दलों, खास कर कांग्रेस, से नेताओं को पार्टी में शामिल कर अपना आधार तैयार किया है. अभी हाल ही में त्रिपुरा में इसकी बानगी देखने को मिली जहां कांग्रेस छोड़कर आए कार्यकर्ताओं के बल पर भाजपा ने सत्ता पर कब्ज़ा किया.

त्रिपुरा में, सात कैबिनेट मंत्रियों में से चार – 55 फीसदी से भी ज़्यादा – ऐसे नेता हैं जो 2017 में कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए थे. ये मंत्री हैं: रतनलाल नाथ, सुदीप रॉय बर्मन, प्रणजीत सिंह रॉय और मनोज कांति देब.

उधर, अरुणाचल प्रदेश में, मुख्यमंत्री पेमा खांडू समेत लगभग सारे मंत्री कांग्रेस से बगावत कर भाजपा में आए नेता हैं. इनमें से चोवना माइन, होन्चुन नगन्दम और कामलुंग मोसांग के नाम प्रमुख हैं. हाल के वर्षों में अरुणाचल की संकटग्रस्त राजनीति दलबदल, अस्थिरता और जटिल राजनीतिक समीकरणों से परिभाषित होती रही है. इसका पूरा फायदा उठाते हुए, भाजपा ने दलबदल के सहारे राज्य में अपना आधार निर्मित किया.

असम में 2016 के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा ने पहली बार राज्य की सत्ता संभाली. पार्टी वहां एक गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही है. इसके 11 मंत्रियों – कैबिनेट और राज्यमंत्री – में से करीब 45 प्रतिशत कांग्रेस से आए नेता हैं.

सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों में प्रमुख हैं हेमंत विश्व शर्मा, जिन्होंने एक तीखे विवाद के बाद 2015 में कांग्रेस को छोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया था. शर्मा को पूर्वोत्तर में भाजपा की पैठ से संबंधित प्रमुख रणनीतिकार माना जाता है. गैर-भाजपाई पृष्ठभूमि वाले अन्य मंत्रियों में प्रमुख हैं: सुम रोंघांग और पल्लव लोचन दास.

उधर मणिपुर में, भाजपा के छह मंत्रियों में से मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह समेत पांच अन्य पार्टियों से आए नेता हैं.

पश्चिमी राज्य

महाराष्ट्र एकमात्र ऐसा राज्य दिखता है जहां भाजपा के सारे मंत्रियों का अतीत पार्टी से ही जुड़ा रहा है. राज्य में पार्टी और शिवसेना का गठबंधन सत्ता में है. पार्टी के 16 कैबिनेट मंत्रियों और सात राज्यमंत्रियों में से कोई भी दलबदलू नहीं है.

परंतु, पड़ोसी गुजरात का किस्सा अलग है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य में भाजपा ने कुछ समय से कांग्रेस के नेताओं को अपने पाले में लाने का काम तेज़ कर दिया है, खास कर लोकसभा चुनावों से पहले ऐसा देखा जा रहा है. राज्य में 24 मंत्रियों में से सात बाहरी नेता हैं.

हाल ही में कांग्रेस छोड़कर आए जवाहर चावड़ा को कैबिनेट मंत्री बनाया गया, जबकि धर्मेंद्र सिंह जडेजा को राज्यमंत्री की शपथ दिलाई गई. कैबिनेट मंत्रियों में कांग्रेस से 2018 में भाजपा में आए कुंवरजी बावलिया, और जयेश राडिया भी शामिल हैं. जबकि राज्यमंत्रियों योगेश पटेल, जयदर्शन सिंह परमार और पर्बतभाई पटेल भी इसी पृष्ठभूमि के हैं.

गोवा में, जहां भाजपा मनोहर पर्रिकर के देहांत के बाद अपने सरकार बचाने में कामयाब रही है, पार्टी के पांच में से दो कैबिनेट मंत्री विश्वजीत राणे और मौविन गोडिन्हो पूर्व में कांग्रेस में रह चुके हैं.

कम दलबदलुओं वाले राज्य

महाराष्ट्र के अलावा कुछ अन्य राज्यों में भी भाजपा सरकार में दूसरी पार्टी से आए विधायकों को बहुत कम जगह दी गई है. हिमाचल प्रदेश में 12 कैबिनेट मंत्रियों में से मात्र एक अनिल शर्मा ही गैर-भाजपाई पृष्ठभूमि के हैं. उन्होंने अक्टूबर 2017 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामना थामा था.

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास की अगुवाई वाली सरकार के 10 भाजपाई मंत्रियों में दो दूसरी पार्टी से आए नेता हैं- अमर कुमार बौरी और रंधीर कुमार सिंह पहले झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) में हुआ करते थे.


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भाजपा का क्या कहना है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बुनियाद वाली भाजपा ने हमेशा ही एक अलग तरह की पार्टी होने का दावा किया है, जो एक मूल विचारधारा एवं खास मान्यताओं का पालन करती है.

हालांकि, पार्टी स्वीकार करती है भाजपा में अन्य दलों से आए भिन्न विचारधाराओं के नेताओं के कारण इसका मौलिक चरित्र ‘कमज़ोर’ हुआ है.

अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर भाजपा के एक नेता ने कहा, ‘निश्चय ही, पार्टी का मौलिक चरित्र कमज़ोर हुआ है. हालांकि, पार्टी की बुनियाद पहले वाली ही है और हमारी विचारधारा स्पष्ट है. फिर भी ये तो ज़ाहिर है कि यदि इतने अधिक बाहरी नेता आएंगे, तो कुछ बदलाव भी होगा.’

‘पर राजनीति में इन बातों से बचा नहीं जा सकता है. चुनावी विवशताएं, जीतने की संभावना और सत्ता पर काबिज़ होने की आवश्यकता बाकी बातों पर भारी पड़ती है.’

(लेख में मानसी फड़के, प्रशांत श्रीवास्तव और चितलीन सेठी का भी योगदान है.)

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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